वहाँ पर न गुरु है और न गुरु का ज्ञान है 

जब साधु से हमें यह ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है और हम अपने आप को इस संत के आगे अर्पण कर देते हैं, तब ही यह अमोलक वस्तु हमारे मन में टिक सकती है, लेकिन अगर यह मन हील-हुज्जत ही करता रहे, तो फिर यह ज्ञान इसमें नहीं ठहरता, क्योंकि हुज्जती मन हमेशा अभिमानी होता है और

 

हर जी को हंकार न भावें|

 

इस हरी को अहंकार अच्छा नहीं लगता| अवतार बाणी में बाबा अवतार सिंह जी भी फरमाते हैं कि --

 

जिस गुरसिख नूं निवणा भुल्ले, उत्थे गुरु खलोंणा नहीं|

 

 

अगर यह मन निमाणा नहीं बनता, नम्र भाव में नहीं आता तो वहाँ पर न गुरु है और न गुरु का ज्ञान है| अगर गुरु के आदेशों-उपदेशों को हम अपने जीवन में नहीं उतारते, तो हमें वास्तविक आनंद प्राप्त नहीं हो सकता| दास, दातार के चरणों में यही अरदास करता है की दातार ऐसी मेहर करे, ऐसी कृपा करे की आप सन्तजन महापुरुष ज्ञान के साथ कर्म जोड़कर इस संसार का भला मांगते रहें, भला करते रहें| ऐसी कामना ज्ञानवान महापुरुष ही कर सकते हैं|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 12-13

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