निरंकार केवल सत्संग भवन तक सीमित नहीं, ये सर्वत्र है|

you are reading spiritual literature at www.MAANAVTA.com
you are reading spiritual literature at www.MAANAVTA.com

 

संत महापुरुष कहते हैं कि-

ज्यों तिरिया पीहर बसै, ध्यान रहे पिय माहिं|

तैसेई भगत जगत में, हरि को भूलत नाहिं|

सुमिरन की सुध यों करों ज्यों सुरभि सूत माहिं|

कह कबीर चारा चरै बिसरत कबहूँ नाहिं|

 

साधसंगत! इसीलिए गुरुमुख हर समय सिमरन करता है, मन से प्रभु का आठों पहर एहसास करता है और मन से ही झुकता है| यह नहीं की हाथ तो दूसरे गुरुसिख के पाँव की तरफ आ रहे हों, लेकिन मन में सोच रहा हो की यह मेरे सामने कहाँ से आ गया? ऐसी भावना कभी गुरुमुख के ह्रदय में नहीं होती और न होनी चाहिए| तभी वह सुख पा सकता है और हर प्रकार से, संसार में आगे बढकर यश प्राप्त कर सकता है| अगर ऐसा नहीं करता तो बेड़ियाँ (माया) उसे खुद ही बाँध लेती हैं, और वह कहीं बढ़ नहीं पाता| जब यह ज्ञान प्राप्त होता है, तो चारों तरफ यह कहने को मन करता है की यह मुझ पर जो एहसान हुआ है, इससे ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे कोई कीमती 'लाल' हिस्से में आ गया हो| इसका बदला तो जन्मों-जन्मों तक भी नहीं चुकाया जा सकता| गुरु की यह अपार कृपा हुई है| लेकिन अगर एक तरफ तो हम कहें की इस दातार का एहसान नहीं चुकाया जा सकता और दूसरी तरफ इस बात की हम कौड़ी कीमत भी न डालें| हमें मन में भी यही महसूस न हो की चौगिर्द हमारे ये दातार है, तो समझो इसे जानकार भी हम अनजान बने हुए हैं|  इस निराकार को अंग-संग जना दिया गया है, लेकिन फिर सांसारिक इंसान की तरह, हम शायद इसे दूरियों पर मान रहे हैं, शायद किसी और की नज़रों के मोहताज हम बने हुए हैं| परख करने वाली निगाह कहीं सीमित हैं, शायद सत्संग-भवन में है, भवन के बाहर नहीं जहाँ पर हम रह रहे हैं, वहाँ कोई नहीं देख रहा| जहाँ व्यापार कर रहे हैं, शायद वहाँ नहीं देखा जा रहा| लेकिन प्रभु द्वारा सर्वत्र सब कुछ देखा जाता है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 51-52