कबीरा सदगुरु क्या करे, जो सिखन में चूक

शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज
शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज

दास (पूजनीय शास्त्री जी) ने निवेदन किया की हुज़ूर, आप इजाजत दें तो एक बात और ध्यान में आई है, वह भी आपसे पूछकर अपना गुरसिखी जीवन सहज व् सरल भाव से जी सकूं| शहनशाह जी ने मुस्कराते हुए कहा, "पूछो, जब तक मेरा शरीर साथ देता है, मैं आपके हर प्रशन का उत्तर देने का यत्न करूँगा|" दास ने अनुमति पाकर निवेदन किया -"हुज़ूर, कई लोग सेवा भी तन-मन-धन से कर रहे हैं, सुमिरन में भी बराबर तल्लीन रहते हैं और साध-सांगत में भी नियमित रूप से भाग लेते हैं, पर उनके जीवन में जो बहार आनी चाहिए, वह देखने को नहीं मिलती|" शहनशाह जी ने थोडा तीखे स्वर में फरमाना शुरू किया, "शास्त्री साहब, मरीज दवाई तो पूरी मर्यादा से ले पर परहेज का ध्यान न रखे तो दवाई भी बे-असर होने लगती है| इसी तरह सेवा-सुमिरन-सत्संग, सचमुच ही जीवन को निखार देने वाली दवाईयां हैं| परन्तु, हम ये सब कुछ करते हुए भी जब अभिमान में चूर हो जाते हैं, निंदा में खचित हो जाते हैं, दुसरे के अवगुणों को छाटने में एड़ी-चोटी का जोर लगाने लगते हैं, अपने आपको ऊंचा और दूसरे गुरसिख बहन-भाईयों को नीची दृष्टि  से देखने लगते हैं और सद्गुरु के आदेशानुसार जो गुण हमें अपनाने चाहिएं, उनको अपनाने की बजाय मनमुखों वाला जीवन जीने लगते हैं तो हम अपने रास्ते से भटक जाते हैं| उसका ही यह फल होता है की जो निखार व् बहार हमारे जीवन में आनी चाहिए थी, वह नहीं आ पाती|"  यह कह कर हुजूर ने आखें मूँद लीं और कुछ क्षण बिलकुल मौन भाव से बैठे रहे| फिर अकस्मात मौन तोड़ते हुए,, आँखें खोलते हुए, फरमाने लगे, "ज्ञान का दाता  सदगुरु होता है| सदगुरु जीवन जीने की जो जाच सिखाता है, उस पर गुरसिख को चलना होता है| अगर कोई गुरसिख सदगुरु के वचनों का उल्लंघन करके मनमती से काम लेता है तो सेवा, सुमिरन, सत्संग भी उसका पूरा सहारा नहीं बन पाता|" शहनशाह जी ज़रा गंभीर स्वर में फरमाने लगे,"गुरु मर्यादा का पालन किए बिना गुरसिख का लोक खुशियों से नहीं भर सकता| गुरु अगर कहता है की मीठा बोलो, किसी से छल-कपट न करो, किसी का हक न दबाओ, किसी का दिल न दुखाओ, तो जो गुरु के आदेशानुसार ऐसे कर्म करते हैं, उनके जीवन में बहार भी आती है और निखार भी| वे मुक्ति के हकदार भी बने रहते हैं|

 

एक लम्बी सांस भरकर शहनशाह जी ने कहा की| शास्त्री साहिब, कबीरा सदगुरु क्या करे जो सिखन में चूक|

 

---सतगुरु शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज

साभार : बुक शहनशाह, पेज 17-18