ब्रह्मज्ञानी तुरंत आपकी मनोकामना पूरी कर देगा|

 

 कई लोगों का ख्याल है की सत्य की चर्चा करने से ही या सच के बारे में पढ़ने से ही सच (परमात्मा) का ज्ञान हो जाएगा| परन्तु मात्र सच का बयान कर लेने से, जीवात्मा की भूख नहीं मिटने वाली| जिस तरह से पिता के पेट को भोजन प्राप्त हुआ, तो पिता की सेहत बनी, इसी तरह से बेटे-बेटियों को भी भोजन ग्रहण करना पड़ेगा, तब ही उनके शरीर में रक्त बढ़ेगा| वर्ना तो हम बचपन से जैसे सुनते आ रहे हैं की 'पानी-पानी' कहने से कभी किसी की प्यास नहीं बुझी है| इसी तरह से एक बच्चा पढ़ता है, स्कूल जाता है, फिर कालेज में दाखिल होता है, पढ़-लिख कर वह एम्.ए. की डिग्री प्राप्त करता है| उसका छोटा सगा भाई है, वह कभी स्कूल नही गया, पढ़ा नहीं, वह बहुत प्रसन्न हो रहा है, कहता है - देखना, अब मुझे एक महीने के अन्दर-अन्दर नौकरी मिल जाएगी| डिग्री तेरे बड़े भाई को मिली है, उसको तो नौकरी मिलने की संभावना है, लेकिन तू कहाँ उस डिग्री के सहारे नौकरी की आस लगाए बैठा है? यह काम किसी और के किए होने वाला नहीं| यह काम प्रत्येक मनुष्य ने संव्य करना है, निश्चित विधि के अनुसार करना होता है|

 

कौन सी विधि अपनानी होती है? क्या करना होता है जिज्ञासु को? जिज्ञासु के लिए तो शर्त सिर्फ इतनी है की जिज्ञासु केवल परमात्मा को जानने की ही जिज्ञासा लिए हुए हर सज्जन के पास जाए| वह जहाँ भी जाए, जिस किसी से भी मिले, उसके सामने केवल एक परमात्मा को जानने की ही जिज्ञासा प्रकट करे| यदि वह सज्जन उसी पल उसकी जिज्ञासा को शांत कर दे, उसे परमात्मा की जानकारी करा दे, तो वह वहीँ नतमस्तक हो जाए| अगर वह सज्जन हमें परमात्मा से मिलाने के बजाए किन्ही और बातों में उलझाना चाहे, तो हमें आगे बढ़ जाना चाहिए और अपनी तलाश को तब तक जारी रखना चाहिए, जब तक हमें परमात्मा की पहचान कराने वाले सतगुरु न मिल जाए| आप विश्वास रखें की परमात्मा दयालु है| इसलिए अगर आपकी जिज्ञासा सच्ची होगी तो निरंकार-दातार रहमत करेगा और शीघ्र ही वह आपकी ऐसे ब्रह्मज्ञानी से भेंट करा देगा, जो आपकी मनोकामना तुरंत पूरी कर देगा, परन्तु जिज्ञासा और खोज जारी रखनी होगी|

 

इस ज्ञान की प्राप्त के लिए जहाँ गुरु की कृपा आवश्यक है, वहीं जिज्ञासु की तीव्र जिज्ञासा भी जरूरी है| ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के अनुसार जिज्ञासा इतनी होनी चाहिए, जैसे यदि कोई इंसान डूब रहा हो, पानी में उसके श्वांस जा रहे हैं, तो उसको उस वक्त पानी से बाहर निकलने की जैसे इच्छा होती है, जिस तरह से उसकी एकाग्रता होती है की मैं इस पानी से बाहर आ जाऊं और खुली सांस ले सकूं, मेरा मुख पानी से बाहर आ जाए, उसकी तो तड़प उस वक्त होती है उसी तरह से इंसान की तड़प इस प्रभु-दातार के लिए होनी चाहिए| वैसी ही तीव्र इस भवसागर से पार उतरने की इच्छा होनी चाहिए|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-1, पेज 23-24