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ब्रह्मज्ञान तभी फलता फूलता है जब...

 

साधसंगत! गुरुमुख महापुरषों के दर्शन बड़े भाग्य से प्राप्त होते हैं| महापुरषों के मिलाप, महापुरषों की संगति हमारे जीवन को ऊंचा किया करती है, जो गुरुमुख महापुरषों के मिलाप की चाहना अपने मन में रखते हैं, उनकी संगति करते हैं, उनके ज्ञान की संभल सरलता से हो जाती है| तभी तो कहा गया है कि-

 

सेई मिलाईं, जिनां मिलयां तेरा नाम चित आवे|

 

अर्थात हे दातार! ऐसे भक्तों, महापुरषों से मिलाप करा, जिनके मिलाप से और किसी चीज का नहीं बल्कि तेरा ही ध्यान आता है| जिस तरह से हम बाज़ार में जा रहे हैं, तो सामने कोई महापुरुष आता दिखाई देता है| जैसे ही वह हमारे सामने आता है, हमारा और किसी चीज की तरफ ध्यान नहीं जाता की उसके इतने मकान हैं, इतनी कोठियां है, इतनी उसकी रिश्तेदारियां हैं, बल्कि उसको देखते ही पहले जो ध्यान आएगा, वह यही है की यह देखा हुआ महापुरुष आ रहा है| हम एकदम उस महापुरुष को देखते हैं, तो इस निराकार का ध्यान आ जाता है| अभी वह हम तक पहुँचता नहीं, हम मुख से कुछ नहीं कहते, परन्तु मन से पहले ही 'धन निरंकार' कहना शुरू कर देते हैं| इसलिए महापुरषों ने, संतों ने हमेशा साधसंगत की विशेषता बताई है की साधसंगत के बगैर पार-उतारा नहीं| भक्ति की रंगत भी तभी चढ़ती है| ब्रह्मज्ञान भी तभी फलता-फूलता है, जब साधसंगत की जाती है, जब सेवा की जाती है, जब सिमरन किया जाता है| जिस तरह से हम अपने घरों के आगन में कुछ पौधे लगाते हैं| हम पौधे लगाने तक ही सीमित नहीं रहते| हम उनको पानी भी देते हैं, खाद भी देते हैं| हम उनके चारों तरफ बाड़ भी लगते हैं ताकि कोई पशु उनका नुक्सान न कर सके| इसी तरह से इस ज्ञान रुपी पौधे को भी सही मायनों में अगर हम बड़ा बनाना चाहते हैं तो हमेशा गुरुमुख महापुरषों की संगति ही हमें ऐसी अवस्था प्रदान कर सकती है, क्योंकि -

 

बिनु सत्संग विवेक न होई|

 

जिस तरह से चन्दन के पेड़ के पास जो और पेड़-पौधे, बूटे उग जाते हैं, उनके अन्दर भी चन्दन की खुशबू वास कर जाती है, इसी तरह से जो मन से निमाणा बन के, जो सीखने की भावना से महापुरषों की संगति कर लेता है, उसमें भी वो गुरुमुख वाले गुण प्रवेश कर जाते हैं| लेकिन जो अभिमानी होता है, कठोर होता है, अहंकारी होता है, अपने आपको पूर्ण माने बैठा होता है, उस पर प्रभाव नहीं पड़ता| जितनी वनस्पति है, उसमें तो चन्दन की खुशबू प्रवेश कर पाती है| लेकिन बांस कठोर होता है, इसलिए उसमें चन्दन की खुशबू प्रवेश नहीं कर पाती है| इसी तरह जो भी अहंकारी होता है, अपनी विद्या का घमंड जिसने किया है, अपनी लियाकत का मान किया है, जिसने धन-दौलत का अभिमान किया है, अपने शरीर की ताकत का अभिमान किया है, ऐसे अभिमानी इंसान में सद्गुण कभी प्रवेश नहीं किया करते|

 

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 38-39

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