श्राद्ध

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार इंसान की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा कभी नहीं मरती। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भागवद गीता में अर्जुन से यह कहा था कि इंसान का शरीर भले ही मर जाए, लेकिन उसकी आत्मा अजर-अमर रहती है। वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न शरीरों का इस्तेमाल करती है।

पौराणिक कथा के आधार पर आज भी हिन्दू अनुयायियों के बीच यह मान्यता है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा अगले शरीर में प्रवेश करने से पहले भटकती रहती है। लेकिन यह विचरण वह समाप्त कर दे, उसे मोक्ष की प्राति हो इसके लिए हिन्दू धर्म में पितृ पूजा करने का विधान बना हुआ है।

भाद्रपद पूर्णिमा

भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों तक का समय सोलह श्राद्ध या श्राद्ध पक्ष कहलाता है। यह वही समय है जब शास्त्रों के अनुसार देवकार्यों से पूर्व पितृ कार्य करने का निर्देश दिया गया है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध से केवल पितृ ही तृप्त नहीं होते अपितु समस्त देवों से लेकर वनस्पतियां तक तृप्त होती हैं।

।।श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छादम्। भावार्थ : श्राद्ध से श्रेष्ठ संतान, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है। > पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं।

पिंडदान एवं ब्राह्मण भोजन

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध की साधारणत: दो प्रक्रियाएं हैं, पहली है पिंडदान और दूसरी ब्राह्मण भोजन। ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य को तथा पितृ कव्य को खाते हैं। पितृ स्मरण मात्र से ही श्राद्ध प्रदेश में आते हैं तथा भोजनादि प्राप्त कर तृप्त होते हैं।

ब्राह्मणों को भोजन खिलाएं

एकाधिक पुत्र हों और वे अलग-अलग रहते हो तो उन सभी को श्राद्ध करना चाहिए। ब्राह्मण भोजन के साथ पंचबलि कर्म भी होता है, जिसका विशेष महत्व है। साथ ही ध्यान रहे कि ब्राह्मणों के भोजन को पूर्ण विधि-विधान से तैयार किया जाए। इसमें शुद्धता बनाए रखने का विशेष महत्व होता है।

 

श्राद्ध के लिए बलि

श्राद्ध के संदर्भ से शास्त्रों में पांच प्रकार की बलि बताई गई हैं- गौ बलि, श्वान बलि, काक बलि, देवादि बलि तथा पिपीलिका बलि। यहां बलि का अर्थ किसी पशु-पक्षी की कुर्बानी देने से नहीं है। बल्कि आप किस प्रकार का श्राद्ध कर रहे हैं, उसी से संबंधित पशु-पक्षी को भोजन खिलाना होता है। इसे ही शास्त्रों में बलि माना गया है...

कब करें श्राद्ध?

श्राद्ध की इस मूल जानकारी को जानने के बाद अगली जरूरी बात है कब करें श्राद्ध। यूं तो हिन्दू मान्यताओं के आधार पर एक आम बात सभी में प्रचलित है कि जिस भी दिन किसी स्त्री या पुरुष की मृत्यु हो, उसी तारीख को श्राद्ध किया जाता है। लेकिन इसके अलावा भी अन्य तारीख हो सकती हैं.

नवमी के दिन

जैसे कि, सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति संन्यासी है तो उसका श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है। शस्त्राघात या किसी अन्य दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।

यदि मृत्यु तारीख पता ना हो तो

कई बार ऐसा होता है कि हमें पाने किसी पूर्वज का श्राद्ध तो करना है लेकिन हम उनकी मृत्यु तिथि नहीं जानते। ऐसे में यदि हमें अपने किसी पूर्वज के निधन की तिथि नहीं मालूम हो तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इसीलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।

इस दिन भी

आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा को भी श्राद्ध करने का विधान है। इस दिन दादी और नानी का श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह कुछ ऐसी तारीखें हैं जब आप श्राद्ध करवा सकते हैं।

Courtesy : https://hindi.speakingtree.in/allslides/shradh-kya-hai/342404

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