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सत्संग की महिमा (बोध कथा)  

एक गृहणी रोज़ाना अपने आँगन   में दिया जलाया करती थी. एक दिन जब वह दिया जला कर जाने लगी तो अनायास ही दिया बोल उठा, "मातेश्वरी, मैं रोज़ाना तुम्हारे आँगन का अन्धकार हरता हूँ, लेकिन मेरे अपने नीचे सदा अँधेरा छाया रहता है' तुम आंगन का अँधेरा दूर करने के लिए चिंतित रहती हो, इसलिए शाम ढलते ही मुझे जला देती हो. किसी दिन मेरे नीचे का अँधेरा भी दूर कर दो."

गृहणी ने दिए की बात को सुना, उसे आश्वासन दिया और घर के अन्दर चली गयी. वहां उसने आटे  का एक और दिया बनाया फिर उसे जलाकर पहले वाले दिए के करीब ले जाकर रख दिया. 
गृहणी को अन्य दिया अपने पास रखते देखकर पहले वाला दिया बोला, "मातेश्वरी, मैंने तो तुमसे अपने नीचे का अन्धकार दूर करने को कहा था, इसे हरने का भी तो कोई उपाय करो."
गृहणी ने मुस्कुराते हुए कहा, "आप नीचे अब झाँक कर देखो वहां आज अँधेरा नहीं, प्रकाश है."
दिये  ने झटपट अपने नीचे झाँका. आज वहां भी प्रकाश था. वह कृतज्ञ नज़रों से गृहणी की और देखने लगा. 
गृहणी ने मृदुल मुस्कान के साथ कहा, "अकेला दिया अपने नीचे के अंधकार को नहीं हर सकता, लेकिन जब पास ही अन्य दिए जल उठें तो वे सब एक दूसरे के नीचे के अंधकार को हर लेते हैं. 
इसलिए महात्मा संतों की सांगत करने की प्रेरणा देते हैं. दुनिया का मार्गदर्शन करने वाले महात्मा भी संतों के सत्संग में आकर ही अपने अनदेखे अनजाने दोषों से छुटकारा पाने में सफल होते हैं.  यही है सत्संग की महिमा.

 

Image courtesy  : https://sanathanavani.org/wp-content/uploads/2016/11/Satsang-2-1.jpg
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