परमात्मा तो अविभाज्य है फिर आत्मा के रूप में क्यों बंटा?

Shri Ram Kumar 'Sewak' Ji, source Facebook : https://www.facebook.com/rsewak1


4 मार्च को सुल्तानपुरी (दिल्ली ) के संत निरंकारी सत्संग भवन में सत्संग करने का अवसर मिला |वहां एक युवा महात्मा ने प्रश्न किया कि जब परमात्मा टुकड़ों में नहीं बँट सकता तो फिर आत्मा परमात्मा से अलग कैसे है ?यह प्रश्न पहले भी सामने आ चुका था |उत्तर भी वही ध्यान में आया कि-पानी के टुकड़े नहीं होते इसके बावजूद मेरी बाल्टी में जितना पानी होता है वो मेरा पानी कहलाता है इसी प्रकार इस शरीर में जो प्रभु का रूप क्रियाशील है बल्कि पूरे शरीर को क्रियाशील रखे हुए है ,वही आत्मा है |चूंकि यह स्थूल नहीं है,सूक्ष्म है तो हम इसे इन आँखों से देख नहीं सकते लेकिन इसे महसूस अच्छी तरह कर सकते हैं |
महात्मा ने आगे सवाल तो नहीं किया लेकिन उसके चेहरे लग रहा था कि अभी पूरी तसल्ली नहीं है |
सत्संग में वही महात्मा मंच संचालन भी कर रहे थे |
विचार में जो विषय था वो तो अलग था लेकिन बीच में प्रसंग आ गया कि कोई भी बच्चा जन्म लेते ही रोता है,जबकि उसकी सब जरूरतें माँ ने पूरी करनी होती हैं |
माँ की गोद में वह पूर्णतः सुरक्षित होता है इसके बावजूद रोता है तो इसका अर्थ है कि उसमें आत्मा है|यह आत्मा अपने मूल से मिलने की चाहत में रोती है कि प्रभु से मिलाप होगा कि नहीं ?
महात्मा निर्मल जोशी जी एक मंत्र का जिक्र किया करते थे-एकोहम बहुस्याम अर्थात यह प्रभु स्वयं अपनी इच्छा से विभिन्न रूपों में ढल गया |आत्मा भी इसका एक रूप है |यह हर जीव में है इसीलिए उसमें जीवन है |
यह आत्मा परमात्मा का टुकड़ा नहीं है बल्कि परमात्मा का अंश रूप है|इसे किसी ने इस रूप में बनाया नहीं है बल्कि परमात्मा की इच्छा मात्र से यह शरीर में अवस्थित है,इसलिए यह आत्मा परमात्मा का टुकड़ा नहीं बल्कि परमात्मा की रूप है |एक समय आएगा जब यह रूप शरीर में इस तरह उपस्थित नहीं रहेगा तब शरीर मृत हो जाएगा |
जन्म होते समय हर बालक का रोना यह सिद्ध करता है कि हर शरीर का सञ्चालन आत्मा से हो रहा है इसलिए प्रभु ने इंसान को मानव रूप में बनाया है न कि हिन्दू-मुस्लमान-सिख-ईसाई या ब्राह्मण-खत्री-वैश्य,शूद्र आदि के रूप में |
इस प्रकार आत्मा निराकार प्रभु का एक रूप है न कि टुकड़ा ,स्वतः ही प्रमाणित हो जाता है | 

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