गुरसिखी कठिन है, असम्भव नहीं !

लेखक : श्री राम कुमार 'सेवक' जी, मुख्य सम्पादक (अ) www.maanavta.com

गुरसिखी  की महान परम्परा में एक प्रसंग आता है, जिसके अन्तर्गत एक नर्तकी एक गुरसिख से प्रश्न करती है की तुम्हारी दाढ़ी अच्छी है या मेरे कुत्ते की पूँछ? उत्तर में गुरसिख मौन रहता है । 

गुरसिख का जब शरीर त्यागने का समय आया तो उसने अपने निकट खड़े लोगों से कहा की फलां  नर्तकी को बुलाओ । 
उसका नाम सुनकर लोग कानाफूसी करने लगे की आखिरी  वक्त में संत का  ध्यान कहाँ भटक गया? सब्र-सिदक, परिपकवता, भक्ति आदि पर लोगों को शक होने लगा । 
अन्तत: उनकी इच्छा पूरी की गई । नर्तकी  को बुलाया  गया । संत जी बोले, "तुम रोज़ाना पूछती थी  की मेरी दाढ़ी अच्छी है या तुम्हारे कुत्ते की पूँछ?" आज मैं कह सकता हूँ की मेरी दाढ़ी  तुम्हारे कुत्ते की पूँछ से लाख गुना अच्छी है क्योंकि मेरी मेरे गुरु के साथ निभ गयी है । 
पावन बाणी  में लिखा है :
पाणी  भरण पनिहारियां रंगा रंग घड़े । 
भरया उसदा जाणिये, जिस्दा तोड़ चड़े । 
उपमा घड़े  की दी गयी है की उसी पनिहारी का घड़ा भरा हुआ समझिए, जिसका घड़ा उसके घर तक सही सलामत पहुँच जाए । जो बीच में ही दरक जाए वह घड़ा तो ख़त्म हो गया । घड़ा भी ख़त्म और पानी भी । पानी भरने का श्रम भी व्यर्थ चला गया । 
शरीर एक घड़ा है । उसमें जैसे पानी भरा है, हमारे विचारों-कर्मों-व्यवहारों के रूप में । घर मृत्यु के पार है । मृत्यु के समय तक विचारों और कर्मों में संतुलन बनने की जिम्मेदारी है। ध्यान इस प्रभु से निरन्तर जुड़ा रहे ताकि मृत्यु के द्वार तक विचारों-कर्मों-व्यवहारों का जल शुद्ध बन रहे । यह शुद्धता, पवित्रता कायम रह पाये तो फिर दाढ़ी सचमुच सुन्दर हैं । दाढ़ी  तो प्रतीक बन गयी है, भक्ति को निभाने की । 
भक्ति को जी पाने की और निरन्तर जीते चले जाने की प्रक्रिया ही गुरसिखी है । 
श्री गुरु अमरदास जी का उदाहरण ज़हन में आता है । बुज़ुर्ग अवस्था में भी वे अपने गुरु जी के स्नान के लिए नदी से पानी भरकर लाते थे । उनके वस्त्र धोते थे । महान सेवा  थी गुरु अमरदास जी की । 
एक बार गुरु जी ने रात्रि को ही आदेश दे दिया की वस्त्र धो लाओ, सवेरा हो गया । समर्पित गुरसिख की भाँती गुरु जी  के वस्त्र धोने चल पड़े । 
बाद में गुरु जी ने कहा की सुबह तो अब हुई है, तब तो रात्रि थी । तुम क्यों कपड़े  धोने चले गये । 
शिष्य रूप में गुरु जी ने कहा - महाराज जी ! आप यदि रात्रि को सुबह कहें तो मेरे लिए सुबह है और सुबह को रात्रि कहें तो मेरे लिए रात्रि है । 
कहने वाले इसे अन्धविश्वास कहेंगे लेकिन यह विश्वास की अनन्ता  का प्रतीक है । यह विश्वास किन्ही बाह्य परिस्थितियों पर नहीं बल्कि आस्था की गहराई पर निर्मित है । ऐसा विश्वास गुरु को परख चुकने के बाद निर्मित होता है । गुरु की परख होती है - ब्रह्मज्ञान से । 
भक्ति परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित नहीं हुआ करती । परिस्थितियां चाहे बाहरी तौर पर अनुकूल हों अथवा प्रतिकूल हों, भक्तों का मन सदैव एक निराकार प्रभु से जुड़ा रहता है जिसके कारण अनुकूलता-प्रतिकूलता के जवार-भाटे जीवन को प्रभावित नहीं कर पाते । वो सहज भाव से कह पाता  है - तेरा भाणा  मीठा लागे......। 
मन से उत्पन्न कामनाओं का विप्रीत परिणाम कभी मीठा लग ही नहीं सकता जब तक की मन इस निरंकार के साथ जुड़ा  हुआ नहीं हो । 
गुरसिख का मन कभी भी उसके लक्ष्य की  प्राप्ति में बाधक नहीं हो पाता , वह इसलिए क्योंकि मन में प्रभु का निवास होता है । 
गुरसिख शब्द का विश्लेषण करने पर पाते हैं की इसमें दो भाव निहिति हैं -
(1 ) गुरु के प्रति अगाध/अटूट निष्ठा 
(2) सदैव सीखने का भाव 
गुरसिखी के लिए साकार गुरु (सद्गुरु) का सामने होना अति आवश्यक है । सद्गुरु के समक्ष समर्पित हुए बिना गुरसिखी  का आधार निर्मित होना असम्भव जितना कठिन है । 
साकार सद्गुरु के आदेश-उपदेश-निर्देश गुरसिख के जीवन के आधार होते हैं । साकार सद्गुरु समझता है की मायावी संसार में विचरण करने के बावजूद मन को माया में फँसने से कैसे बचाया जाए ?
मन जब मायावी प्रभावों से बचेगा तभी तो अहंकार से बचेगा अन्यथा सूक्ष्म अहंकार उसके शिष्यत्व भाव को चूहे की भाँती कुतर डालेगा । 
शिष्यत्व भाव ही तो सीखने की अवस्था प्रदान करता है । तब एक छोटा बालक भी शिक्षक का रूप धारण कर लेता है । 
एक राजा, पराजय के बाद की हताशा की स्तिथि में किसी गुफा में छिपा बैठा था । प्राण बचाना ही उसका लक्ष्य था, राज्य तो छिन  ही चुका  था ।  उसने देखा की गुफा की दीवार पर कुछ चीटियाँ  चढ़ रही थीं । दीवार की उठान व् ढलान पर संतुलन न बन पाने के कारण वे बार-बार गिर रही थीं लेकिन इसके बावजूद रुक नहीं रही थीं । जैसे ही नीचे गिरतीं फिर दोबारा चढ़ना शुरू कर देतीं और अन्तत: वे दीवार पर चढ़ने में सफल हो गयीं । 
राजा को सबक मिल गया की असफलता से निराश नहीं होना । अपने प्रयास निरन्तर करते जाना है । 
"एक चींटी जब बार-बार की गिरावट से निराश नहीं हो रही तो मैं मानव होकर हताशा के जाल में क्यों फँस रहा हूँ । राजा ने सोचा । 
राजा का लक्ष्य साफ़ हो गया । चींटी भी शिक्षक बन गयी क्योंकि राज्यत्व का अहंकार मन-मस्तिष्क में नहीं था । 
एक परिस्थिति में यदि अहंकार नहीं है तो दूसरी स्तिथि में वह पैदा हो सकता है । अहंकार का स्थायी शमन करने के लिए निरंकार रुपी पानी में स्तिथ रहना होगा । जो पानी में रहता है, उस पर मैल नहीं लगती इसी प्रकार जो निरंकार में रहता है, निरंकार उसे सब विकारों से सुरक्षित रखता है । 
गुरसिखी  कुछ गुणों का नाम है - सब्र-शुक्र सहनशीलता-विश्वास आदि का । ये गुण अपनाने सरल नहीं है परन्तु असम्भव भी नहीं है । जैसे गृहणियां दाल बनाते समय कंकड़ अलग हटा देती हैं इसी प्रकार एक गुरसिख अपने जीवन से अधैर्य-असहनशीलता व् संकीर्णता आदि के कंकड़ हटाता  रहता है । ये जब हट  जाते हैं तो जीवन में जो बचता है - वह होता है -सार । 
सार की तो सदैव सम्भाल ही की जाती है । गुरसिखों को सद्गुरु सदैव से सँभालते रहे हैं तभी तो युग बीतने के बावजूद उनके नाम ज़िंदा रहे हैं । वे शहरों के चौराहों पर लगी मूर्तियों के कारण नहीं बल्कि अपने परिपक्व वव्यवहार के कारण, प्रकाश सतम्भ की भाँती लोगों के दिलों में बसे  रहते हैं। 
यहाँ प्रश्न यह है की गुरसिखी  तो  पावन ग्रंथों व् वाणियों में मिलती है । वर्तमान में क्या ऐसा हो पाना संभव है । उत्तर पर विचार करने पर पाते हैं की भक्ति मार्ग  जितना मुश्किल है, उतना ही आसान भी है । सज्जन ठग, कोड़ा राक्षस, भूमिया  चोर, गणिका वैश्या  आदि जब गुरसिख के रूप में परिवर्तित हो सकते हैं तो कोई भी हो सकता है । सम्भावना मौजूद है - आवश्यकता है इनके जैसी दृढ़ संकल्प शक्ति की । 


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