नौकरी नहीं, सेवादारी --महात्मा गफ्फार खान जी 

महात्मा गफ्फार खान जी
महात्मा गफ्फार खान जी

बाबा गुरबचन सिंह जी सेवादार महापुरषों का बहुत ध्यान रखते थे| उन्हें हंसी-मज़ाक कर के खुश भी रखते थे और उनकी छोटी-छोटी बातों की तरफ ध्यान भी देते थे| ऐसे ही एक सेवादार गफ्फार खान ने अपनी जीवन की बात बताते हुए कहा, "हमारा निजी अनुभव है की बाबा गुरबचन सिंह जी के प्यार में बंधे हुए हम सब लोग सुबह से शुरू होकर देर रात तक मंडल के कार्यों को सेवा समझकर करते थे| हमने कभी मंडल को अपने से अलग नहीं समझा, न ही कभी घडी की तरफ देखा था| अगर काम अधिक होता तो सुबह से रात तक लगे रहते थे| यहाँ तक की नहाने-धोने, खाने-पीने की सुध भी न ही रहती थी| अगर काम कुछ कम हो जाता तो घर जाकर कुछ आराम कर लेते थे, या कोई अन्य व्यक्तिगत (Personal) काम कर लेते थे| हमने हमेशा नौकरी की नहीं बल्कि सेवा की भावना ही रखी और आगे से बाबा जी ने भी हमारी तुच्छ सी सेवा के बदले हमें वह सब कुछ दिया जिसके हम कभी हकदार नहीं थे|"  उदाहरण के तौर पर उन्होंने एक घटना सुनाई|  उन्होंने बताया, "मेरी शादी आ गई| यहाँ सेवा करते हुए कुछ पूँजी जमा हो नहीं पाई थी| माँ-बाप के पास भी केवल गुजारे लायक पैसे थे| जब बाबा जी को पता चला तो उन्होंने पूज्य मंगल सेन जी को बुलाकर आदेश दिया की इसकी शादी है, इसे कुछ दिनों की छुट्टी दे दो| साथ ही सिक्का साहब (Account Incharge) को कहकर इनके शहर के मुखी महात्मा को फोन कर दो की इसकी शादी का सारा खर्च संत निरंकारी मंडल की तरफ से होगा| आप अच्छी तरह इनका विवाह संपन्न करवाने के बाद सारे बिल दिल्ली मंडल में जमा करा दो| शादी धूमधाम से हो गई| सारे रिश्तेदार दोस्त-मित्र भी खुश थे की इनका मिशन कितना महान है जो सेवादारों का भी इतना ध्यान रखता है|

 

साभार: बुक जीवन्त शिक्षक, पेज 85