हितकारी है संतोष

योगेश कुमार, इंदौर, एम्.पी.


संतोष ऐसी मनोवस्था है जिसमे स्थित होकर व्यक्ति सदैव सुखी रह सकता है. संतोष एक सकारात्मक गुण है. कुछ लोग इसे अवगुण मानने की भूल करते हैं की जो कुछ मिला उसी में खुश हो गए तो और ज्यादा पाने की चाहत ही ख़त्म हो जाएगी. विद्यार्थी का उदहारण दिया जाता है की परीक्षा में अंक पाने की दृष्टि से उसे हमेशा असंतोषी होना चाहिए. अगर 50 % अंक मिले हैं तो 70 % पाने की बेचैनी जब तक न होगी तब तक वह आगे कैसे बढ़ सकेगा? वह अगर प्रयास जारी रखकर 70 % पर आ गया तब भी संतुष्ट न रहकर 80 % या 90 & पाने की और उसे आगे बढ़ना होगा. उस छात्र का इस रूप में सक्रिय होना तो अच्छा है लेकिन अगर किसी छात्र को असफलता हाथ लगती है तो कई बार वह आत्महत्या करके जीवन लीला समाप्त करने के बारे में ही सोचने लगता है. उसके इस आत्मघाती कदम के कारण सब कुछ असंतोष की आगे में जलकर राख हो सकता है. प्रगति के लिए की जा रही कोई भी यात्रा संतोष के ठोस धरातल पर ही हो सकती है असंतोष की फिसलन भरी धरती पर तो तेज दौड़ना क्या सहज रूप से चल पाना भी मुश्किल होता है.

संतोष का आभाव कभी कभी इतना विकराल रूप धारण कर लेता है की युद्ध जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है. महाभारत के युद्ध में पांडवों में तो संतोष था लेकिन कौरवों का असंतोष इतना प्रबल था की वहां भगवन श्री कृषण के शांति प्रयास भी सफल न हो सके. दूसरी और भरत और श्री राम जी के परम्संतोश की स्थिति देखने में आती है. भरत जी 14 वर्ष तक अयोध्या के राजा रहे और राजा होकर भी उनके संतोष की स्थिति यह की सिंहासन पर संवय न बैठकर राम जी की चरण पादुका (खडाऊं) रखकर राज्य चलाया. आज तो स्थिति यह है की दो भाइयों में जब बंटवारा होता है तो एक-एक चीज बराबर-बराबर बांटी जाती है. चालाकी असंतोष की मित्र है और नीति विहीन लोग उसके समर्थक. किसी गाँव में दो भाइयों में विवाद के बाद बंटवारा हो गया. सब कुछ बंट गया. भैंस एक ही थी उसे कैसे बांटा जाय. उनमें से एक भाई  बहुत  चालक था कहने लगा भैंस का आगे के मुख वाला हिसा उसकी रौनक होती है. मुझे इतना कोई लोभ नहीं है मैं भैंस के पीछे का हिस्सा लेकर ही संतोष कर लूँगा. छोटा भाई सीधा-साधा था वह सहमत हो गया. चारा छोटा भाई खिलाता क्यों की आगे का हिस्सा उसका था लेकिन जब वह दूध निकलने का प्रयास करता तो बड़ा भाई बोल पड़ता - ख़बरदार वो हिस्सा मेरा है. इस प्रकार भैंस को चारा लाने और खिलने का कार्य तो वह छोटा भाई करता रहा और दूध उसका चालाक भाई पीता.

छोटे भाई की परेशानी देखकर किसी ने उसे उपाय सुझाया. अब जब बड़ा भाई  दूध निकलने बैठा तो छोटे भाई ने भैंस के मुंह पर डंडा मारा. क्रोध में आकर भैंस ने बड़े भाई में मुंह पर लात मार कर घायल कर दिया. बड़ा भाई छोटे भाई को बुरा-भला कहने लगा. छोटे भाई ने जवाब दिया भाई - मुख मेरे हिस्से में है, कुछ भी करूं, तुम्हे क्या? परिणामस्वरुप फिर से सही बंटवारा किया. संतोष रखने वाले के पक्ष में परमात्मा कहाँ-कहाँ से सहयोग करने वाले भेजता है. संतोष का आधार और दिशा ठीक रखना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है. आलस्य और निष्क्रियता को त्यागना ही होगा. संतोष के नाम पर हाथ पर हाथ रखकर बैठना उचित नहीं.

नौकरी लग गयी, मकान बन गया, मुकदमें में विजय हुई अन्य ऐसे ख़ुशी भरे अवसरों पर आदमी मित्रों परिजनों को एकत्रित करके उनको भोजन कराता है, वस्त्र और उपहार आदि देता है. इससे उसकी ख़ुशी को और चार-चाँद लगते हैं लेकिन साथ-साथ यदि भाव भी यह बना रहे की प्रभु कृपा से जो मिला उसमें मेहमत मेरी थी और बरकत परमात्मा ने डाली, तो ख़ुशी का वह अवसर और भी खूबसूरत हो उठता है. दूसरी और अगर ख़ुशी के अवसर को आत्मप्रशंसा या अभिमान वाले भाव से ढक दिया जाये तो उसका आनंद कायम नहीं रह पाता. किसान की फसल उसके पसीना बहाने पर तो निर्भर है ही मौसम के रूप में था प्रभु कृपा के तौर पर उसकी पैदावार कभी कम या कभी ज्यादा हो सकती है. किसान संतोष रखता है की मैंने तो परिश्रम किया लेकिन फिर भी बाढ़ सब कुछ बहा ले गई तो कोई बात नहीं. बाढ़ के साथ नई उपजाऊ मिटटी आ गई फसल, नए उत्साह से उगाऊँगा. इस प्रकार उसके संतोष युक्त श्रम का, प्राय प्रतिफल दुगना पैदावार के रूप में प्राप्त होता है.

जीवन में जो संतोष अपनाये रखते हैं वे विपरीत परिस्थितयों में भी सफल होते हैं. सुख और आनंद हमेशा उनके दामन में होता है. इस प्रकार हम देखते हैं की संतोष आवश्यक भी है और हितकारी भी है.


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