Uploaded on 10th September, 2011

Rev. Yash Gujjar Ji
Rev. Yash Gujjar Ji

Writer : Rev. Yash Gujjar Ji

 

City : Delhi

 

E-mail : yashgujjar@maanavta.com

प्रेममय बने रहें

लेखक : श्री यश गुज्जर जी, दिल्ली

संतों महापुरषों ने अपने सदगुरु देव की शलाघा विविध रूपों में की है. सदगुरु नर रूप में नारायण हैं, कृपा के सागर हैं, महामोह रुपी गहन अंधकार को नाश करने वाले हैं. संत तुलसीदास जी राम चरितमानस में कहते हैं :
बदऊँ गुरु पद पदुम परागा I  सुरुचि सुबास सरस अनुरागा I
अमिय मूरिमय चूरन चारू I सामान सकल भव रूज परिवारू I


सदगुरु के चरण कमलों की धूल की महिमा बहुत निराली है यह सुरुचि सुगंध और अनुराग रस से भरी हुई है. भव रोगों का जो विशाल परिवार है यह उन रोगों को समूल नाश करने वाली अमर मूल (संजीवनी बूटी) है I

सदगुरु के चरणों को चरण कमल कहकर सन्तों ने संबोधित किया है. कमल जो जल में रह कर भी उससे ऊपर रहकर संसार को अपनी सुन्दरता और सुगंध प्रदान करता है I  गुरु की इतनी प्रशंसा सुनकर कोई गुरु की कृपा और सदगुरु का चरणार्बिन्द  का सानिध्य चाहता है. इसे प्राप्त करने का प्रयास करता है I 

सदगुरु की कृपा दृष्टि प्राप्त करने के लिए महारानी मीरा महल से सन्त रविदास जी की कुटिया पर आती थीं I  उन्हें यह सोचकर संकोच नहीं हुआ था की एक महारानी को जूते बनाने वाले सन्त की कुटिया पर जाते देख लोग क्या कहेंगे I  जिन्हें यह चिंता लग गई की गुरु दर पर जाने से लोग क्या कहेंगे तो उसकी भक्ति यात्रा पहले पड़ाव पर ही समाप्त हुई समझना चाहिए I

साधू के दरबार में जाने से पहले अपनी अक्ल-सयानप, चालाकी-चतुराई बाहर जोड़े उतरने की जगह ही छोड़कर आनी चाहिए I  ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों नहीं, अथवा किन्तु-परन्तु का भक्ति मार्ग में भला क्या काम?

सन्त कबीर जी भगवन भोले शंकर की नगरी काशी में रहकर प्रभु भक्ति करते थे I  गुरु रामानंद जी से दीक्षा पाने के लिए वे गंगा तट की सीढ़ियों पर लेट गये I  स्नान के लिए जाते समय अँधेरे के कारण गुरु रामानंद जी का पैर कबीर जी को लग गया I  उनके मुंह से अकस्मात ही निकला - राम कहो राम के प्यारे I  कबीर जी को 'राम' मिला तो फिर कभी छूटा नहीं, दूर नहीं हुआ I दूर होता भी कैसे यह तो सर्वत्र एक रस भरपूर नज़र आते हैं I  इसके बिना नहीं - 'सुई धरण को ठौर' सन्तों ने हमेशां यही कहा है I

किसी सज्जन ने एक भक्ति भाव वाले बालक से पूछा बेटा बताओ भगवन कहाँ नहीं है, मैं तुम्हे सही उत्तर देने पर एक पेन इनाम में दूंगा I  बालक ने उत्तर दिया अंकल मैं आपको एक नहीं एक दर्जन पेन दूंगा अगर आप ये बताओ भगवन कहाँ नहीं है I  दोनों के प्रशन अपनी जगह हैं लेकिन उत्तर तो हमेशा से एक ही रहा है और रहेगा भी एक ही की परमात्मा सर्वत्र है कण-कण में पत्ते-पत्ते में व्याप्त है I सदगुरु की कृपा से इसे जाना जा सकता है, जानकर माना जा सकता है I  इसलिए सदगुरु की जगह-जगह हर सन्त-भक्त ने कीर्ति गई है क्योंकि इस की कृपा से ही यह सत्य सर्वत्र मौजूद होने का एहसास हुआ I  प्रेम से यह प्रकट होता है तथा अपने भक्त को प्रेममय बनाए रखता है -
हरि व्यापक सर्वत्र समाना
प्रेम ते प्रकट होही मैं जाना I

- रामचरित मानस

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