आत्मा ही सत्य है!

लेखक : श्री यश गुज्जर जी, दिल्ली 

स्वप्न, जाग्रति और सुसुप्ति तीन अलग अवस्थाएँ हैं| आत्मा तीनों अवस्थाओं की साक्षी है| आत्मा ही सत्य है| सोया हुआ और मरा हुआ इंसान देखने में एक सी स्थिति में नज़र आता है| किसी सोये हुए व्यक्ति पर प्राण घातक हमला कर दिया जाए तो वह बचाव के लिए प्रतिकार नहीं कर पाता, क्योंकि उस समय इन्द्रियों सहित निंद्रा ग्रस्त है| इसलिए शरीर को सत्य नहीं कहा गया| शरीर में लगातार परिवर्तन हो रहे हैं| व्यक्ति का चेहरा-कद-व्यवहार लगातार बदल रहा है| वह बचपन में कुछ, युवावस्था में कुछ और वृदावस्था में कुछ और हो जाता है, जो अपरिवर्तनशील है वह है आत्मा और वह ही सत्य है|


मिथिला नरेश महाराजा जनक राज भवन के शयन कक्ष में सो रहे थे| उन्होंने स्वपन देखा की उनके राज्य पर डाकू ने आक्रमण कर सेना को पराजित कर उन्हें बंदी बना लिया है| विजयी शत्रु ने राजा जनक को आज्ञा दी की तुम्हारे प्राण नहीं लिए जा रहे किन्तु राज्य और वस्त्र तथा आभूषण छोड़कर एक कपड़े में राज्य से बाहर चले जाओ|


राजा जनक कई दिनों के भूखे-प्यासे चले जा रहे हैं| उनके पैरों में छाले हैं, भूख से उनका बुरा हाल है तभी उन्हें आशा की एक किरण दिखाई दी| पता लगा सामने ही अन्न क्षेत्र है, जहाँ भिखारियों को खिचड़ी बांटी जा रही है| बिखरे बाल, धूल से सने शरीर वाले भिक्षुक नज़र आने वाले राजा जनक हाथ फैलाकर खिचड़ी की बची-खुची  खुरचन हथेलियों पर स्वीकार करने ही वाले थे की चील ने झपट्टा मारा और खिचड़ी बिखर  गयी| हाथ पर चील के पंजे की खरोच से वे चीख उठे, तथी उनकी नींद खुल गयी| राजा जनक ने आस-पास गौर से देखा| वह राजभवन का भव्य शयन कक्ष था| रजा के मुंह से अकस्मात ही निकल पड़ा - यह सच है, या वह सच था? उन्हें बीमार समझकर राजवैद्य को बुला लिया गया की कहीं उनकी मानसिक अवस्था विचलित तो नहीं हो गयी | परन्तु वह मनोरोग तो था नहीं वह तो ऐसा प्रशन था जो हर मानव मन में उठना चाहिए| यह सच है या वह सच था, जीवन सच है, या स्वप्न में जो देखा वह सच था इसका उत्तर वहाँ पर किसी के पास था ही नही|


राजमहल में अष्टावक्र जी पधारे और उन्होंने राजा जनक को समझाया - राजन! जो एक काल में सत्य हो, दूसरे काल में सत्य न रहे, वह सत्य नहीं होता| स्वप्न देखने वाले आप वहाँ भी थे और जीवन जीते हुए आप यहाँ भी हैं| 'आप' अर्थात दृष्टाभाव से यहाँ वहाँ मौजूद आत्मा ही सत्य है| बाकी सब झूठ ही झूठ है| राजा जनक उसके बाद शरीर में रहकर भी शरीर में नहीं रहे तथा वैदेही कहलाए| दुःख-सुख, राग-द्वेष, मान-अपमान, धूप-छाँव में एक सामान अवस्था में रहने वाले हो गए| सत्य का प्रभाव है ही इतना प्रभावशाली की झूठ उसके सामने टिक नहीं पाता| यह आत्मा सत्य है, निरंतर है, अविनाशी है|


सद्गुरु की शरण में आकर ही सत्य की प्राप्ति होती है और मिथ्या से छुटकारा मिलता है जैसे राजा जनक को अष्टावक्र जी से ये सत्य बोध प्राप्त हुआ था | इसे प्राप्त करना जीवन का परम लक्ष्य है जो प्राप्त कर लेते हैं वे धन्यता के पात्र हैं|


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Aatma param aatma ka hissa hai, jis parkaar parmaatma satya hai na marta hai na janmta hai sada atal hai usi tarah aatma bhi atal hai na marti hai na smaapat hoti hai yeh is param sattya k sath judh jati hai ye bhi amar hai niraakar ka ansh hai is liye isko sattya mana gaya hai.

Ramesh Sharma