Added on 06/24/2015

ये कहाँ आ गयें हम ?

लेखक : श्री समरेश कुमार जी, जमशेदपुर (झारखण्ड)

                   हम सब एक ही रब के बन्दें ; लड़ने में क्यों उम्र गुज़ारें ,
मिलजुल कर हम जीवन नइया ; भव सागर से पार उतारें ,
पत्थर लेकर जो निकले हैं घरों से; ज़रा जाकर कोई कहदे उनसे ,
उनके घर भी काँच के हैं ; सोच-समझकर पत्थर मारें। 

यूँ तो कहा जाता है  कि इंसानी जन्म अन्य सभी जन्मों से श्रेष्ठ जन्म है, जो की एक अकाट्य सच्चाई भी है।  तभी तो कहा गया है - "बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा"। 


ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड की रचना के साथ-साथ और भी अनेकों चीजें बनाई,  जैसे- नदियाँ, पहाड़, झरने, पेड़-पौधे, फूल इत्यादि। साथ ही साथ ईश्वर ने हम इंसानों की रचना भी की, और ना कि सिर्फ रचना की ; बल्कि अपनी तमाम की हुई रचनाओं में से इसे एक श्रेष्ठ उपलब्धि भी दी, सुनने, सोचने और समझने की उपलब्धि, बोलने, हँसने और हँसाने की उपलब्धि ताकि इंसान ईश्वर की बनाई हुई इन तमाम चीजों का ठीक ढंग से रख-रखाव कर सके और आपस में प्यार-मिलवर्तन से रह कर ईश्वर द्वारा निर्मित इस संसार को एक स्वर्ग सा नज़ारा दे सके। अपनी इन तमाम उपलब्धियों की महत्वत्ता को समझते हुए, इंसान काफी वर्षों तक इस संसार में एक अनुकरणीय व आदर्श जीवन जीता रहा, जैसे-जैसे समय बीतता गया, इंसानी जरूरतें भी बढ़ती चली गयी। आरंभ में जनसँख्या कम थी इसलिए खाने-पीने की विशेष चिंता नहीं रहती थी, जो भी मिला खा लिया और जहां कहीं भी जगह मिली सो गए।
                                                                                                                
धीरे-धीरे जैसे जैसे समय बीतता गया, भौतिकवादी सामग्रियों की आवश्यकताएं भी बढ़ती चली गयी, और जैसा की हम जानते हैं कि  "आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है" तो इन आवश्यकताओं के साथ-साथ समझदारी और भी प्रगाढ़ होती चली गयी जिसके बल-बूते विभिन्न प्रकार के अविष्कार भी होते चले गए। अब धीरे धीरे इंसान खाना पकाने, कपडे बुनने और खेती करना भी सिख गया। जरूरतों के आधार पर ही इंसानों ने अपने आप को अनेक प्रकार की कार्यशैलियों में विभक्त कर लिया। कोई कपड़े धोने का काम करने लगा तो कोई कपड़े सिलने का काम करने लगा, किसी ने जूते बनाने की जिम्मेवारी संभाल ली तो किसीने विद्द्या बांटने की जिम्मेवारी संभाल ली, इस प्रकार से इंसान ने खुद को विभिन्न प्रकार की कार्यशैलियों में विभक्त कर लिया। इन्ही कार्यशैलियों ने आगे चल कर  जातीवाद का रूप ले लिया।

आज की तारीख में धीरे-धीरे, जैसे-जैसे  समय बीत रहा है अपनी-अपनी जरूरतों के आधार पर  इंसान भौतिकवादी होता चला जा रहा  है, इस संसार की चकाचौंध में खोता चला जा रहा है। ये भी एक अजीब विडम्बना है कि  "खलकत के सुखो को तो भोग रहा है लेकिन जिसने इस खलकत की रचना की है, उस खालिक को ही आज इन्सान भूलता चला जा रहा है" । 

ऐसी परिस्थिति में इंसान अध्यात्मवाद की राह छोड़, भौतिकवाद की राह का अनुसरण कर रहा है, अनेको-अनेको सांसारिक उपलब्धियां हासिल करके , कई सारे नए अविष्कार करके आज इंसान खुद को सर्वशक्तिमान समझने लगा है।  फलस्वरूप इंसान अहंकारी होता चला जा रहा है, अपने आप को विभिन्न प्रकार की जातियों में तो इंसान ने पहले हीं विभक्त कर रखा था, अब इंसानों ने अपने आप को विभिन्न प्रकार के कौमों में भी बाँट लिया, अब इंसान; इंसान नहीं बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख व इसाई कहलाया  जा रहा है। 

हा हा हा हा …..  हँसी आती है इंसान की इस कहीं ना पहुँचने वाली स्वार्थ-सिद्धि हेतु इस रेस को देख कर, सच पूछो तो आज इंसान को पता हीं नहीं कि वो अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में धीरे-धीरे अपना अस्तित्व ही खोता चला जा रहा है। 

                                                यूँ तो धरती पर इंसानों की संख्या बढ़ती चली जा रही है पर गौरतलब है कि इंसानियत घटती चली जा रही है। फलस्वरूप धरती पर मार-काट बढ़ते चले जा रहे हैं, पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता चला जा रहा है, आज धरती एक बार फिर से पाप के बोझ तले दबकर त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है। ये सब देख कर बरबस ही मुखारबिंद से ये प्रश्न निकल पड़ता है कि "ये कहाँ आ गयें हम ? " 

संकट की इसी घडी को टालने हेतु,  धरती के बिगड़े हुए इसी संतुलन को सँवारने हेतु, इस धरा पर एक बार फिर से स्वर्गीय वातावरण लाने हेतु, इंसान को इंसानियत का पाठ पढ़ाने हेतु, आज ईश्वर ने अपने निराकार स्वरुप को "सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज" के रूप में अवतरित किया है। जो कि हम इन्सानों को अपने सही अस्तित्व का एहसास दिला रहें हैं कि हम सब एक पिता की  सन्तानें हैं, हम सब एक हैं ,  हम सब आपस में भाई-भाई हैं।

परन्तु जिस प्रकार से कहा गया है की "मार्ग मोती बिथरे अँधा निकसियो जाये", ठीक इसी प्रकार से आज फिर से इंसान वही अपनी पुरानी गलतियां दोहराने में लगा हुआ है कि "जब आएं तो बात न मानी, मरे तो पीछे चलते हैं, कहे अवतार जगत में मूरख आज भी मन की करते हैं"।

धन्य हैं वे जिन्होंने वक्त के रहबर को समय रहते पहचान लिया और अपने आप को इनके चरणों में पूर्ण रूप से अर्पित कर एक समर्पित जीवन जी रहे हैं। वे बधाई के पात्र हैं। यहीं हैं वो जो अपने इंसानी चोले का असली लाभ उठा रहें हैं। ब्रह्मज्ञान की अनमोल दात प्राप्त कर लेने के उपरान्त इन्हे पता चल चुका होता है कि "ना हम हिन्दू , ना सिख, ईसाई, ना हम मुसलमान हैं; मानवता है धर्म हमारा, हम केवल इंसान हैं"। 

"सिया राम मैं सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोरी जुग पानी" वाली भावना इनके दिलों में घर कर चुकी होती है और फिर ये सबके भले के बारे में ही सोचते हैं। वास्तव में इस धरती पर स्वर्गीय वातावरण लाने का, इस वसुधा पर वसुधैव कुटुम्बकम के सपने को साकार करने का, यही एक रास्ता है। और यही अब तक के अवतरित सभी पीर-पैगम्बरों का सपना भी रहा है। 

अतः आइये हम सब मिलकर इस अनुपम एवं अनुकरणीय कार्य में सम्मिलित हो कर अपनी-अपनी महत्वपूर्ण सहभागिताएं निभाएं और इस धरा से नफरत, वैर, ईष्या आदि जैसी बुराइयों का नाश कर, प्यार की महक से इस वसुधा को एक बार फिर से गुलज़ार कर दें।

जब जब भी मैं देखता हूँ इस हाज़िर नाज़िर को, मुझे मुर्शद का वो कर्म याद आता है;
मैं लायक तो ना था इसके क़दमों के, फिर भी "ये" मुझे गले लगाये जाता है।


लेखक : श्री समरेश कुमार जी, जमशेदपुर (झारखण्ड)


Comments: 5
  • #5

    Niranjan Singh (Friday, 07 August 2015 00:50)

    Bahut hi prerna dayak lekh hai jis ko padh kar sabhi Dharmon ke log faida utha sakte hen. Dhan Nirankar ji.

  • #4

    Yashika kohli (Tuesday, 30 June 2015 12:11)

    Waah ji waah mahapursho ji...Babaji hamesha hum bacho ko apna ashwirad dete rahein taki hum sab milkar unka namm roshan karte rahe...

  • #3

    Kuldeep Punjab (Friday, 26 June 2015 06:44)

    nice nice nice

  • #2

    Kuldeep Chand (Thursday, 25 June 2015 07:20)

    Baba ji bless you all type of hapiness, and strong power in your holy pen.

    Kuldeep Chand Punjab

  • #1

    PAWAN KUMAR KOHLI (Wednesday, 24 June 2015 07:52)

    बहुत ही सुन्दर और अनमोल शब्दों में मानवता धर्म का अवलोकन किया है , "यह कहाँ आ गए हम " किधर जाना था और किधर चल पड़े ,जन्म के समय प्रभु से वादा करके आये थे , हमेशा आपका सुमिरण करेंगे आप को याद करेंगे मगर इस माया रुपी नगरी में आकर भौतिकवादी वस्तुअों में अपने जीवन को समेत लिया है , इस नगरी में खो गए है , इंसांनियत इंसान खोता जा रहा है , मगर जब सदगुरु महाराज जी के ज्ञान की शरण मिल जाती है तब उसे ज्ञान होता है मै जीवन में क्या करने के लिए आया था और क्या कर रहा हूँ। सदगुरु महाराज जी और संत-महात्माओ जी के शरण के बिना इसको समझना मुमकिन नहीं है। " मानवता को आयो बचाये सुन्दर यह संसार बनाये"

    आदरणीय समरेश कुमार महात्मा जी का यह लेख बहुत अच्छा है उन्होंने अपने इस लेख में मानवता वाले धर्म का प्रचार किया है , बाबा जी के चरणो में यही अरदास बनती है कि भविष्य में भी ऐसे लेख लिखते रहे जोकि हमेशा प्रेरणादायक होते है जिनसे हमेशा ही बहुत कुछ सिखने के लिए मिलता है। बाबा जी महात्मा जी की कलम को दिनों-दिन शक्ति प्रदान करते रहे। । धन निरंकार जी