Name : Rev. Samresh Kumar Ji

City : Jamshedpur, Jharkhand

Mobile No. 9709262996

E-Mail ID : samreshkumar10@maanavta.com

 

 

यही है वो जिसकी हमें सदियों से तलाश थी
लेखक : श्री समरेश कुमार, जमशेदपुर, झारखण्ड
द्वापर में भगवान श्री कृष्ण ने, कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा -
यदा यदा हिं धर्मस्य ग्लानिभर्वती भारत.
अभ्युत्थानं धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम.
अर्थात - "हे भारत, जब-जब धर्म की हानी और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब हीं मै, अपने रुप को रचता हूँ. अर्थात प्रकट करता हूँ".  
वैसे तो परमात्मा अजन्मा व अविनाशी है, ये हर-हमेशा हमारे अंग-संग रहता है, परन्तु जब-जब इसे ऐसी महसूसियत  होती है कि "अब धरती पर पापों का बोझ अत्यधिक बढ़ता जा रहा तथा इंसान अपने निजी स्वार्थ हेतु गलत रास्तों पर चलता चला जा रहा है", तब हमें मानवता का पाठ पढ़ाने हेतु "ये" (निरंकार) अपने आप को साकार रूप में अवतरित करता है. "ये" हमारी ही  तरह किसी कुल में जन्म लेता है, किसी का बेटा बनता है तो किसी का पिता बनता है तथा ठीक हमारी हीं तरह दुनिया के तमाम रिश्तें-नाते भी निभाता है, वैसे तो "ये" सर्वज्ञानी है परन्तु हमें दर्शाने के लिए कि - "बिनु गुरु भवनिधि तरही न कोई, जौ बिरंची संकर सम होई" ये गुरु करता है, तदुपरांत इस दुनिया के सभी भूले-भटके इंसानों को सही रास्ता दिखाने हेतु तथा संपूर्ण विश्व को मानवता के एक-सूत्र में पिरोने हेतु प्रयासरत हो जाता है. परन्तु, हम इंसानों की हर युग में यही विडंबना रही है कि " जब तक ये हमारे बीच रहता है, हम इसकी तरफ बिल्कुल हीं ध्यान नहीं देते; परन्तु इसके चले जाने के उपरांत आंसू बहाते हैं, इसके लिए उपवास, व्रत तथा विभिन्न प्रकार के कम-कर्म-काण्ड करने लग जाते हैं. 
"जब आयें तो बात ना मानें, मरे तो पीछे चलते हैं.
कहे अवतार जगत में मूरख, आज भी मन कि करते हैं".
इतिहास गवाह है, जितने भी सारे पीर-पैगम्बर इस धरती पर आये; धर्म के वैसे ठेकेदारों ने जिन्हें "धर्म" का शाब्दिक अर्थ भी मालूम नहीं, ने भोले-भाले इंसानों को अपने झूठे प्रभोलनों के जाल में फंसा कर इन्हें सताया. परन्तु "ये" इतना महान है कि हमारी किसी भी बदसलूकी पर तनिक भी नहीं खिंझता, उलटे हम पर और भी ज्यादा प्यार लुटाता चला जाता है. 
जिस प्रकार एक पिता अपने बेटे को जगाते हुए कहता है - उठ जा बेटे अब सुबह हो गई है, दिन निकल आया है, उठ देख सूरज चढ़ आया है, सुबह-सुबह उठना सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है, अब तो उठ जा बेटे.परन्तु वो नालायक बेटा नींद की आगोश में इस कदर समाया हुआ है कि इधर से उधर करवट बदलता रहता है पर उठता नहीं, चिल्लाता है कि मैं अभी नहीं उठूँगा, नींद की आगोश में वो अपने पिता को लात मारने से भी नहीं कतराता. परन्तु वो पिता उस बेटे को फिर भी प्यार ही करता है, उस से नम्रता से ही पेश आता है तथा उसे तब तक जगाता रहता है जब तक कि वो जाग नही जाता क्यूँकी उसे पता होता है कि ये अभी नींद में है इसलिए ऐसा कर रहा है, नींद से जाग जाने के बाद ये ऐसा नहीं करेगा.
ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी हमें युगों-युगांतर से जगाता आ रहा है परन्तु हम ही हैं कि जागना नहीं चाहते, खुद को रूढ़िवादी बंधनों में जकड़े रखते हैं, अपनी आँखों के ऊपर अहम् का पर्दा डाले रखते हैं तथा इस परवरदिगार को कष्ट पहुंचाने से भी नहीं हिचकिचाते. यूं तो धर्म-ग्रंथो के पठन-पाठन में हम कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ते पर जब बात आती है ईश्वर को जान लेने कि तो हम ये कहते हुए खुद को किनारे कर लेते हैं कि - "कलयुग केवल नाम आधारा, सुमिरि-सुमिरि नर उतरहिं पारा" . हम सुमिरन में तो आस्था रखते हैं परन्तु एक साधारण सी बात का भी हम जरा सा गौर नहीं करते कि जिस प्रकार एक भूखे को भूख मिटाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, अगर वो केवल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के केवल नाम ही लेता रहे तो उसकी भूख कभी नहीं मिट सकती. ठीक इसी प्रकार ईश्वर को बगैर जाने केवल इसके नाम का रटन करते रहने से हमारा भवसागर से पार-उतारा हो पाना कभी संभव नहीं हो सकता. इसलिए तो कहा गया है -
"दीदार की तलब के तरीको से बेखबर
दीदार की तलब है तो पहले निगाह मांग."
अब बात आती है निगाह मांगने की. यहाँ निगाह शब्द का तात्पर्य ज्ञान-चक्षु (ब्रह्मज्ञान) से है, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हर युग में ये ज्ञान-चक्षु केवल और केवल समय के सदगुरु से ही प्राप्त हुए हैं. जिन्होंने समय के सदगुरु को पहचान लिया तथा सदगुरु से ज्ञान-चक्षु की प्राप्ति कर ली. उनका जीना-मरना दोनों ही सफल हुआ. परन्तु वे, जो अभी भी गफलत की नींद में सोये हुए हैं एवं जात-पात, उंच-नीच तथा भेष-भूषा के अंध-विश्वाश तले दबे हुए हैं उनके लिए ये एक सुनहरा अवसर है कि वे गफलत कि नींद से जाग जाएँ व इस समय के रहबर (सदगुरु) की शरण में आ कर ज्ञान-चक्षु की प्राप्ति कर लें, फिर तो उन्हें खुद ब खुद समझ आ जायेगी कि वास्तव में "यही है वो जिसकी हमें सदियों से तलाश थी", तब हमारे जेहन से खुद ब खुद ये विचार उत्पन्न होने लगेंगे कि- 
"तू हीं राम है, तू रहीम है; तू करीम कृष्ण खुदा हुआ. तू हीं वाहेगुरु,तू  ईसामसीह हर नाम में तू समा रहा".


Do Share Your thoughts about this Article/Pome in the FORM GIVEN BELOW. *************** *****************
God Bless All is loading comments...
*********************