Uploaded on 25th February, 2012 at 01:15 midnight

तीखी जुबान बेहद खतरनाक

हिन्दी आध्यात्मिक लेख

लेखक : श्री समरेश कुमार जी, जमशेदपुर, झारखण्ड


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श्री समरेश कुमार जी
श्री समरेश कुमार जी

 


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तीखी जुबान बेहद खतरनाक
हिन्दी आध्यात्मिक लेख 

 
अब वो दिन लद गए जब लोगों के हाथों में हथियार दिखते थे और हम पहले से ही सजग हो जाते थे कि हो सकता है ये मुझे कोई नुकसान पहुंचाने आ रहा हो. अब तो लोग हथियार हाथों में लेकर नहीं बल्कि मुँह में छिपाए फिरते हैं. एक ऐसा हथियार जिसके प्रयोग से आवाज नहीं होगी मगर दर्द इतना होगा की सामने वाले की जान तक चली जाए.

जी हाँ आपने बिल्कुल सही समझा, ज़ुबां को ही इंसान अब हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगा है.

ये भी एक अजीब विडंबना है कि जो चीज जिसलिए बनी है, उसका इस्तेमाल ठीक उसके विपरीत किया जाने लगा है.

उद्दाहरण के तौर पर, बन्दूक व बमों का अविष्कार आत्मरक्षा व लोगों को मुसीबतों से बचाने के लिए किया गया है मगर ये लोगों को मुसीबतों से बचाने के बजाय उल्टे, लोगों को मुसीबतों में फंसाते चले जा रहें हैं.

ठीक इसी प्रकार ईश्वर ने इंसान को ज़ुबां दी है, इसलिए नहीं की वो एक - दूसरे से लड़ाइयाँ करते फिरें, तेरी - मेरी करते फिरें; बल्कि इसलिए कि वो 
एक - दूसरे से अपने सुख़ - दुख साँझा कर सकें, अपनी मीठी बोली से ना कि सिर्फ अपने जीवन में बल्कि संपर्क में आने वाले हर - एक के जीवन में भी मिठास घोल सकें. मगर अफ़सोस, जैसा कि किसी शायर ने कहा है -
बातों से अगर बात बने तो फिर बात ही क्या है,
मगर अफ़सोस बातों से तो कुछ हासिल नहीं होताI 
ज़ुबान तीखी हो तो खंजर से गहरा जख्म देती है,
ज़ुबान से क़त्ल करनेवाला क्या कातिल नहीं होता?

बेशकसबसे बड़ा कातिल वही होता है जो जुबान से क़त्ल करता है. यूँ तो महाभारत का युद्ध कौरवों एवं पांडवों के बीच हक़ की लड़ाई के लिए लड़ा गया था, पर जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस युद्ध के पीछे सबसे बड़ा कारण क्या था!

वो चार शब्द जो द्रोपदी ने दुर्योधन पर ठहाके लगाते हुए कहे थे - "अंधे की औलाद अंधी"

वैसे ये तो विधि का विधान है कि जो होना है वो होकर रहेगा. महाभारत के  युद्ध को भी होना था, ये होकर रहता लेकिन अगर द्रोपदी ने वो चार शब्द ना कहे होते तो कम से कम "ज़ुबान" इस युद्ध का कारण ना बनती, ज़ुबान बदनाम होने से बच जाती!
ज़ुबान तो महज एक वस्तु है, दरअसल ये निर्भर इस्तेमाल करनेवाले पर करता है कि वो इसका इस्तेमाल किस तरीके से करता है.

हमें हमेशा संभाल कर अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल करना चाहिए, हमेशा इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि हमारी बातों से किसी को ठेस ना पहुंचे क्यूँकी कहा गया है कि " ज़ुबान पर लगी चोट बहुत जल्दी ठीक हो जाती है मगर ज़ुबान से लगी चोट को ठीक होने में कई सदियाँ बीत जाती है ".
इसलिए तो संत कबीर जी लिख डाला -

 "ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होए"

हमने ये तो सुना या पढ़ा ही होगा कि - भगवान श्री रामचन्द्र जी ने जब सव्यम्वर में धनुष तोड़ा था तो परशुराम कितने क्रोधित हुए थें और क्रोध में आकर उन्होंने किस लहज़े में प्रभु श्री राम से बात की थी. अगर प्रभु श्री राम चाहते तो एक पल में परशुराम को अपनी ताकत का एहसास करा सकते थे क्यूँकी वे स्वयं विष्णु के साक्षात् अवतार थे, मगर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया बल्कि उनके हर सवाल का जवाब बड़े ही अदब से मीठे बोल में दिया. प्रभु श्रीराम के मीठे वचन ने परशुराम को जिसने पूरी श्रृष्टि से क्षत्रियों को मिटा देने की ठानी थी, इस कदर प्रभावित किया कि उन्हें प्रभु श्रीराम के चरणों में झुकना पड़ा. ये है मीठी बोली का प्रभाव.

वास्तव में कोयल और कौवे दिखने में तो बिल्कुल एक जैसे होते हैं लेकिन पहचाने अपनी - अपनी बोली के कारण जाते हैं. ठीक इसी प्रकार " संत " भी अपनी मीठी बोली से समाज में अपना एक अलग छाप छोड़ते हैं, वे औरों से अलग नज़र आते हैं.

आग लगी आकाश में झर - झर गिरे अंगार,
संत ना होते जगत में तो जल मरता संसार.

यूँ तो आग हर एक जुबान में लगी हुई है, चारो तरफ से शोलों कि बारिश हो रही है; शुकर है संतो का जो इन शोलों की तपिश को सहन कर सभी को शीतलता प्रदान किये चले जा रहे हैं. वे निरंतर लगे हुए हैं हर जुबान पर लगी आग को बुझाने में. ऐसे - ऐसे महान संतो की ही देन है कि धरती बची हुई है वरना तो कब की जल के खांक हुई होती.

वर्तमान में समय के रहबर सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ब्रह्मज्ञान की अनमोल दात प्रदान करके हम सभी को ऐसे ही संत बनने की प्रेरणा दे रहें हैं.
अतः आइये हम सभी प्रतिज्ञा ले कि - हम कभी किसी का दिल नहीं दुखायेंगे, किसी से कड़वा नहीं बोलेंगे क्यूँकी सतगुरु ने हमें भी संत की उपाधि बक्शी है, तो हमारी भी कोशिश होनी चाहिए कि हम कर्म भी संतों वाले ही करें.

हम सभी को सत्गुरु  ने वो नज़र 
बक्शी है जिसके अनुसार इस ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाला हरेक प्राणी इस एक परमपिता परमेश्वर की संतान है, अतः हम सभी एक हैं. जब ये समझ कायम हो जाती है तो फिर जुबान से खुद - ब - खुद मीठे रस टपकने लगते हैं अर्थात मीठे बोल स्वतः ही निकलने लगते हैं क्यूँकी अब तो ये बात दिल में घर कर जाती है कि
" अब किसको पत्थर मारूं कौन पराया है, शीश महल में हर एक चेहरा अपना लगता है "
 
ना कि सिर्फ जान-पहचान के लोगों से बल्कि संपर्क में आने वाले हरेक व्यक्ति से मीठा बोले जिससे वो भी प्रेरित हो कर इस ओर कदम बढ़ाने के लिए अग्रसरित हो. ऐसा करके हम अपना नाम उन संतों की श्रेणी में अंकित करें जिनके बारे में कहा गया है कि -

" संत बड़े परमार्थी शीतल जाके अंग,
औरों को भी शीतल करें देकर अपना रंग ".

 

 


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