Name : Rev. Samresh Kumar Ji

City : Jamshedpur, Jharkhand

Mobile No. 9709262996

E-Mail ID : samreshkumar@maanavta.com

 

"संतोष", सभी सुखों का स्रोत

लेखक : समरेश कुमार, जमशेदपुर, झारखण्ड,
"संतोष", ये महज एक शब्द नही बल्कि सभी सुखों का स्रोत है. आज के समय में हर इन्सान को इसकी  सख्त आवश्यकता है I
आज अगर हम किसीको दुखी देखते हैं तो इसका सिर्फ एक ही कारण है "असंतोषी होना" .
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई एक दुसरे से आगे निकल जाना चाहता है, पर अफ़सोस की बात तो यहाँ ये है की उसे पता हीं नहीं होता की वास्तव में उसे जाना कहाँ है.
                                                      अगर किसी के पास साईकिल है तो उसकी तमन्ना मोटरसाइकिल पर चढ़ने की होती है, मोटरसाइकिल आते हीं वो चारपहिया वाहन खरीदने के लिए प्रयासरत हो जाता है, अब अगर उसे ये भी हांसिल हो जाये तो वो उसमें भी variety तलाशने लग जाता है. इस तरह भाग-दौड़ करते-करते अंततः एक दिन उसकी जिन्दगी काल का ग्रास बन जाती है और वो अपने हीं द्वारा जुटाए गए सुख़-सुविधाओं के साधनों का उपभोग नहीं कर पाता I
क्या इसीलिए परमात्मा ने हमें ये इंसानी तन बक्शा है कि हम केवल वस्तुओं को जुटाते जुटाते अपनी उम्र गुजार दें?
नहीं, बिल्कुल नहीं II अगर हमारे पास वस्तुएँ हैं तो निश्चित तौर पर हम उसका उपभोग करें और अगर नहीं हैं तो उसे पाने कि कोशिश अवश्य करें पर उसके पीछे पागल ना बनें I
इस बारे में किसी विद्वान ने एक बहुत हीं सुन्दर लाइन लिखी है- "निश्चित को छोड़ कर अनिश्चित कि ओर ना भागें; कहीं ऐसा ना हो कि अनिश्चित तो अनिश्चित है, निश्चित से भी हाँथ धोना पड़ जाएँ".
इस विषय पर एक कहानी बहुत हीं प्रसिद्ध है -
एक गाँव में कही से एक जंगली बन्दर आ पहुंचा, जो आये दिन तरह तरह के उत्पात मचाते रहता था. वो बन्दर अक्सर रात को किसी न किसी के घर में घुस कर खाने पीने की वस्तुओं को  बर्बाद कर दिया करता था, परन्तु किसी के भी पकड़ में न आता था. गाँव के सारे लोग उससे दुखी रहने लगें. अंततः एक विद्वान व्यक्ति ने उन गाँववालों को उस बन्दर को पकड़ने कि एक युक्ति सुझाई, जिसके तहत एक खुले मैदान में गड्ढा खोद कर उसमें एक ऐसा संकरा मूँह वाला घड़ा गाड़ दिया गया जिसके अन्दर हाँथ घुसाई तो जा सकती थी पर मुट्ठी बंद कर के निकली नहीं जा सकती. फिर उस संकरें मूँह वाले घड़े में चना डाल दिया गया. रात हुई, गाँव वालें  पेड़ के पीछे छिप  कर उस खुराफाती बन्दर के आने का इंतज़ार करने लगें. थोड़ी हीं देर में उनकी इंतज़ार की घडी ख़त्म हुई और वो बन्दर आया, आते हीं उसने घड़े के अन्दर अपने हाँथ डाल दिया और चने निकालने का प्रयास करने लगा, परन्तु घड़े का मूँह अत्यन्त संकरा होने की वजह से वो अपना हाँथ मुट्ठी बंद कर के नहीं निकाल पाता था. वो इतना लालची व मुर्ख था कि घड़े के अन्दर से मुट्ठी खोल के हाँथ निकालना ही नहीं चाहता था और अंततः उसकी इसी लालच ने उसे डुबो दिया, गाँववालों ने उसे पकड़ लिया और दूर जंगल में जा कर छोड़ दिया. इस तरह से उन्हें इस खुराफाती बन्दर से मुक्ति मिल गई.
वो बन्दर अगर चाहता तो मुट्ठी खोल के भी हाँथ निकाल सकता था और खुद को मुसीबत में पड़ने से बचा सकता था पर उसकी लालच व असंतोष ने उसके विवेक को मार दिया जिस कारण वो आसानी से गाँववालों के हांथों में आ गया.
इससे ये बात सिद्ध होती है कि वक़्त पर विवेक भी उन्ही का साथ देता है जो "संतोषी" होते हैं.
 ध्यान दें, इसका ये मतलब कतई नहीं कि "हम जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए प्रयास करना बंद कर दें और कहने लगें कि मैं दुनिया का सबसे ज्यादा संतोषी आदमी हूँ".
 नहीं "संतोष" का ये मतलब कतई नहीं होता.
"संतोष" प्रयास से भागना नहीं सिखाता अपितु थोड़े में ज्यादा की मह्सुसियत करते हुए कठिन से कठिन समय को भी सरल बनाना सिखाता है.
"जितना दिया है बहुत दिया है, दातार तेरा पल पल शुक्रिया है".
जब ये शुक्रिया अदा करनेवाली भावना हमारे अन्दर घर कर जाएगी, वास्तव में "सुखी" कहलाने के हक़दार तो हम तब हीं बन पाएंगे और  सुखी वही हो सकता है जो "संतोषी" हो, "संतोषी" वही हो सकता है जिसे इस परमपिता परमेश्वर पर दृढ़ विश्वाश हो,  इस परमपिता परमेश्वर पर दृढ़ विश्वाश वही हांसिल कर सकता है जिसे ईश्वरीय ज्ञान(ब्रह्मज्ञान) हांसिल हो और ईश्वरीय ज्ञान उसे हीं हांसिल हो सकता है जिसने सत्गुरु कि शरण ली हो.
इसलिए तो कहा गया है- "जो सुख़ को चाहे सदा, शरण राम की लै".
आइये हम इसकी शरण में आने के उपरान्त इसके बनाये हुए भाणे में खुद को रखते हुए, ये जो भी दे उसे सहर्ष स्वीकार करते हुए हर पल इसका शुक्रिया अदा करते चले जाएँ. तभी जाकर हमारा लोक सुखी व परलोक सुहेला हो सकता है.

Please Share your Views

God Bless All is loading comments...