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Rev. Samresh Kumar Ji
Rev. Samresh Kumar Ji

Name : Rev. Samresh Kumar Ji

 

City : Jamshedpur, Jharkhand

 

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प्रेमा-भक्ति
लेखक : श्री समरेश कुमार जी, जमशेदपुर, झारखण्ड 


भक्ति है नाम समर्पण का, शर्तें इसमें मंजूर नहीं;
क्या हुआ, कैसे हुआ, ये पूछना भक्ति का दस्तूर नहीं!

भगवान श्री कृष्ण ने गीता के सातवें अध्याय में कहा है -


चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुक्रितिनोअर्जुन !
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ !!
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकाभाक्तिर्विशिश्यते!
प्रियो ही ग्यानिनोअत्यर्थमहम स च मम प्रियः !!

"हे भारतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन; उत्तम कर्मवाले अर्थार्थी ( सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला ), आर्त (संकटनिवारण  के लिए भजने वाला), जिज्ञासु ( मुझे यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला ) और ज्ञानी अर्थात  निष्कामी, ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं, उनमें भी नित्य मुझे एकीभाव से स्थित हुआ अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है, क्यूँकी मुझे तत्त्व से जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यंत प्रिय है."  
(श्रीमदभगवतगीता, अध्याय ७, श्लोक संख्या १६ एवं १७)


आज संसार में भक्ति तो हर कोई कर रहा है मगर महत्ता तो उस भक्ति की होती है जिसे परमात्मा परवान करता  है. अगर केवल नाम रटन की धुन को हीं भक्ति कहेंगे तो सड़क की किनारे बैठ कर भीख मांग रहा भिखारी भी हमसे कई गुना आगे है, पर यहाँ गौरतलब है की भीख मांग रहा वो भिखारी राम का नाम जरूर ले रहा होता है मगर उसका ध्यान तो लोगों के जेब पर होता है कि लोग मुझे पैसे दे रहें हैं या नहीं?

भक्ति तो मंदिर मैं भैठा एक पुजारी भी कर रहा होता है, हाँथ में मनका जरूर फिरता रहता है पर ध्यान पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर काट रहा होता है, अर्थात अस्थिर रहता है. ऐसी भक्ति केवल दिखावे कि भक्ति होती है, जिसे ईश्वर कभी परवान नहीं करता. तभी तो संत कबीर जी को लिखने कि जरूरत पड़ी -


माला फेरत युग गया, फिरा ना मन का फेर;
कर का मनका डारी दे, मन का मनका फेर!

डर से भक्ति करना या सांसारिक पदार्थों के लिए भक्ति करना या फिर सिर्फ जिज्ञासा तक ही सीमित रहना, ये सभी मानव कि वो अवस्थाएं जिसे इंसान आज वास्तविक भक्ति समझ बैठा है.

पर वास्तव में भक्ति है क्या ये बातें उपर्युक्त्त लाइनों में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है. कुछ ऐसा ही शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी ने अवतार वाणी में लिखा है -


जग न जाने भक्ति क्या है हरि को पाना भक्ति है;
त्याग के सारे रगड़े झगडे गुरु रिझाना भक्ति है!

(संपूर्ण अवतार वाणी, शब्द संख्या ३०१)

"गुरु रिझाना अर्थात प्रभु को रिझाना ". पर प्रभु को रिझाया कैसे जाए?
साधारण सी बात है "कलाकार की कलाकारी का सम्मान ही कलाकार का सम्मान होता है". ये ईश्वर भी एक कलाकार है इसने अपनी कला कि विद्वता से इस सुन्दर ब्रह्माण्ड की रचना की, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, फल-फूल,
ऊँचें-ऊँचें पर्वत तथा नदियाँ बनायें और साथ हीं सभी जीवो में श्रेष्ठ मानव की भी रचना की. इन सभी रचनाओं में से मानव शरीर की रचना को ईश्वर की अदभुत्त रचना कहा गया है. क्यूँकी वैसे तो ईश्वर ने सभी जीवों में अपनी ज्योत (आत्मा ) एकसमानता से डाली है परन्तु जीवन-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा पाने की समर्थता केवल इंसानी शरीर को ही हासिल है. अगर हम परमात्मा की सच्ची भक्ति करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें इसका बोध हासिल करना होगा, तदुपरांत हर किसी में हरि का रूप स्वयं हीं दिखाई देने लगेगा, हमारी जिंदगी में प्रेम का वास हो जायेगा, ईष्या, वैर व मानसिक संकीर्णताएँ स्वतः हीं मिट जाएँगी.


बांटती नहीं सरहदे अब जोडती हैं;
गिलास वो आधा अब भरा नज़र आता है,
काली घटा में ठंडी फुहार है;
नजरिये में छुपा वो राज़ नज़र आता है.


यहीं से हमारी प्रेमाभक्ति की शुरुआत होती है क्यूँकी सप्रेम भक्ति का पर्याय है प्रेमाभक्ति.
जिसमे सिर्फ आनंद हीं आनंद है क्यूँकी चित्त ( मन ) अब पूर्ण रूप से सत्चितानन्द के साथ जुड़ चुका होता है.


प्रेम ना बाड़ी ऊपजे, प्रेम ना हाट बिकाए;
राजा प्रजा जो रुचे शीश दिए ले जाए. 

तो आइये हम सब भी ईश्वर के इस निरंकार स्वरूप का मर्म जानने के उपरान्त, हर किसी में हरि के रूप का दर्शन-दीदार करते हुए अर्थात इस कलाकार की कलाकारी को विशेष तवज्जो देते हुए, "प्रेमाभक्ति" करते चले जाए. ऐसा करने से हमारा लोक तो सुखी होगा हीं साथ ही हमारा परलोक भी सुहेला होगा.


(Writer is a Nirankari Devotee)

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