केवल अध्यात्म से हीं भ्रष्टाचार का पूर्णतः खात्मा संभव


Rev. Samresh Kumar Ji
Rev. Samresh Kumar Ji
लेखक : समरेश कुमार, जमशेदपुर, झारखण्ड

आजकल लगभग दुनिया के हर इंसान के जुबान पर बस एक हीं प्रश्न छाया हुआ है - "भ्रष्टाचार को कैसे ख़त्म किया जाए?", इस अति संवेदनशील सवाल ने लोगों को परेशान कर रखा है: इसका हल निकालते-निकालते लोगों के माथें कि लकीरें सिकुड़ सी गई है. आये दिन इस भ्रष्टाचार रुपी दानव से निजात पाने हेतु विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाएं तो जाते हैं पर अफ़सोस कि बात तो यहाँ यह है कि सारी कि सारी कवायदे टांय-टांय फिस्स हो जाती है और स्थिति ढांक के तीन पात जैसी हीं बनी रहती है.
जो जहां है वहीं से लूट मचाये हुए है. समय-समय पर कुछ अच्छे इमानदार लोगों पर अति-विश्वाश करके उन्हें भ्रष्टाचार मिटाने हेतु रक्षक का तमगा लगाया तो जाता है पर ऐन वक़्त पर इनकी इमानदारी भी दगा दे जाती है और वे भक्षक का रूप धारण कर लेते हैं. अब जब सुधारक स्वयं हीं भ्रष्ट-निति में शामिल हो जाएँ तो ऐसे सुधारक से भ्रष्टाचार के खात्में कि उम्मीद करना आग को आग से बुझाने के उम्मीद रखने के बराबर है, जो कि असंभव हीं नहीं नामुमकिन भी है.

            भ्रष्टाचार,
भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार.......... अब बस! बहुत हो गया!!! डेली के समाचार पत्रो के पन्ने हों या न्यूज चैन्नल्स या फिर समाचार का कोई अन्य मिडिया हीं क्यों ना हो, यहाँ तक कि चाय की दुकान पर भी लोग चाय की चुस्कियों के साथ इसी विषय पर चर्चा करते नज़र आते हैं. ऐसा लगता है मानों मनोरंजन का एक अच्छा विषय मिल गया हो. इसे मनोरंजन का जरिया ना बनने दें, आइये थोड़ा गंभीर होकर इस मुद्दे पर गहराई से विचार करें.
इस विषय पर एक छोटी सी कहानी है-
गुरुकुल कि शिक्षा कि समाप्ति के उपरान्त आचार्यश्री ने अपने शिष्यों कि परिपक्वता की परीक्षा लेने हेतु सभी शिष्यों को एक स्थान पर बुलाकर कहा, "प्यारे बच्चों! मुझे अपनी पुत्री के विवाह हेतु कुछ धन की आवश्यकता है. अब अगर मैं आपके अभिवावकजनों के सम्मुख धन का प्रस्ताव रखूँ तो यह बात मेरे लिए अशोभनीय लगती है, अतः मैं चाहता हूँ की आप सभी शिष्यगण अपने-अपने घरों से कुछ धन या अनाज लाकर मुझे दें, लेकिन ध्यान रहे कि ऐसा करते समय कोई भी आपको देख न पाए वरना मेरी बहुत बदनामी होगी."
      
            शिष्यों ने
आचार्यश्री की बातें ध्यान से सुनी और अपने-अपने घरों की ओर चले गए. दुसरे दिन सभी शिष्यों ने आचार्यश्री को कुछ-न-कुछ दिया. आचार्यश्री एक-एक करके सारे शिष्यों से बस एक हीं सवाल पूछते जा रहें थे, "ऐसा करते समय आपको किसी ने देखा तो नहीं?" सभी ने एक हीं उत्तर दिया, "नहीं आचार्यश्री! मैं इसे बड़े ही यत्न से सभी से छुपा कर लाया हूँ, मुझे किसी ने नहीं देखा. " परन्तु उन शिष्यों में, एक ऐसा शिष्य भी था जिसने आचार्यश्री को कुछ भी दे पाने में असमर्थता जताई. जब आचार्यश्री ने कारण जानना चाहा तो उस शिष्य ने कहा - "हे परम पूज्य आचार्यश्री! आपने जो ज्ञान हमें दिया है उसके अनुसार यह परमपिता परमात्मा तो हमेशा हमें देख रहा होता है तो भला मैं इससे छिपाकर कुछ भी कैसे लाता अतः हे आचार्यश्री! इस प्रकार आपकी शर्तों के अनुसार कि "आपको कोई देख न पाए" मैं आपको कुछ भी देने में असमर्थ हूँ. कृपया मुझे क्षमा कर दें."

       
आचार्यश्री ने उस शिष्य को अपने गले से लगा लिया और कहा, "हकीकत में मुझे धन की नहीं, एक ऐसे शिष्य की आवश्यकता थी जिसने मेरी दी गई शिक्षाओं को अपने जीवन में पूर्णतः उतारा हो. आज मैं तुम्हारी इन बातों को सुनकर बहुत खुश हूँ."

          आगे चलकर
आचार्यश्री ने उस शिष्य से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया. उपर्युक्त प्रसंग से हमें अध्यात्म के महत्व तथा इसे अपने निजि जीवन में अपनाकर खुद के व्यक्तित्व को विकसित करने की प्रेरणा मिलती है. अध्यात्म के बिना भ्रष्टाचार के खात्मे की बातें करना वास्तव में  छननी में पानी भरने के समान है.
केवल आध्यात्मिकता से हीं भ्रष्टाचार का पूर्णतः खत्म संभव है और आध्यात्मिक वही है जिसने आत्मा का अध्ययन किया हो. आत्मा के अध्ययन करने का तात्पर्य परमात्मा का बोध हासिल करने से है. जिसने परमात्मा का बोध हासिल किया हो, उसे यह भली-भाँती पता होता है कि यह परमपिता परमात्मा सदैव हमारे अंग-संग है. यह हमारी हर गतिविधि को देख-सुन रहा है. हम इसकी नजरों से बच नहीं सकते. वह जान जाता है कि, "मैं चोरी करूँ तो कैसे करूँ, मेरी हर हरकत पर इसकी निगाह है. मैं किसी को लूटूं तो कैसे लूटूं, गैर कोई नज़र आता ही नहीं. मैं अगर लूट-मार कर भागूं भी तो कहाँ भागूं, कोई ऐसी जगह नहीं जहां यह न हो."

अगर हम वास्तविकता में भ्रष्टाचार रुपी दानव से पूर्णतया निजात पाना चाहते हैं तो आइये हम  इस  ब्रह्मज्ञान  की  दात  को  प्राप्त  करें  और 
साथ हीं औरो को भी इस ओर प्रेरित करे; तभी जाकर एक भ्रष्टाचार रहित समाज का निर्माण संभव है.

Comments: 20
  • #20

    Madhu chawla (Monday, 02 May 2016 21:46)

    Sabse pehle to ye samjhne ki jaroorat h ki aakhir bhrashta char hai kis chidiya ka naam kewal rishvat lene ka naam nai hai bhrashta char agar hm dekhen to parivar m bhi agar pyar nai hai aur hm dava krte hain bade pyar vale h to ye hmari bhool hogi bhrashta char jb jeevan m gyan roopi roshni milegi to soch badlegi soch badle gi to drishty badlegi drishty badlegi to hm se koi galat kaam nai hoga chetanta aa jayegi kuch bhi karne se pehle dus bar sochenge hm bhool se bhi koi aisa kaam na kare koi dekhe na dekhe nirakar to hmari hr harkat pe nazar rakhe hue hai

  • #19

    jitendra kalbhoot (Friday, 18 March 2016 06:22)

    ek dam sahi hai

  • #18

    Bhagvan sonaiya (Wednesday, 24 February 2016 03:57)

    Good thoughts

  • #17

    Ajay (Tuesday, 15 December 2015 01:25)

    Yes, this is only remedy. And I am surprised to find this remedy here, because I have heard it from the Great Saints

  • #16

    madhu and anjali kashyap (Sunday, 18 January 2015 00:48)

    Very good thought

  • #15

    navin gulati (Thursday, 08 May 2014 11:02)

    Jidher dekhta hu udher tu hi tu hair tera he jalva her najer me hu bu hu hair dhan nirankar ji

  • #14

    Ashish dhamija (Tuesday, 06 May 2014 06:37)

    Wah Ji wah

  • #13

    DEEPAK AHUJA (Monday, 28 April 2014 23:55)

    Good Thought

  • #12

    rajendra sabharwall (Saturday, 22 March 2014 21:25)

    Good thought ...

  • #11

    vaishali (Wednesday, 09 October 2013 20:32)

    Good

  • #10

    god (Monday, 09 September 2013 11:32)

    nice 1

  • #9

    ekdainhindi (Sunday, 07 April 2013 23:38)

    awesome article.

  • #8

    S kumar (Friday, 14 December 2012 22:41)

    Jo bhi insan esko manta he vo bharast honeki soach bhi nahi sakta ishliye me lekhak sh. Samresh ji se sahmat hu ब्रह्मज्ञान की दात को प्राप्त करें और साथ हीं औरो को भी इस ओर प्रेरित करे; तभी जाकर एक भ्रष्टाचार रहित समाज का निर्माण संभव है.

  • #7

    mehul kakkar (Sunday, 28 October 2012 23:57)

    Ye sacchi baat hai...

  • #6

    kanchan (Sunday, 12 August 2012 01:39)

    हमे ये जानना है अगर कोइ महिला ने जालि पहचान पत्र और जालि फोतो और जालि नाम लिख्वाकर अपना पहचान पत्र बनाया है तो क्या सजा महिला को मिलेगि. महिला होने के करन वो कुच भि कर सकति है उस्से कोइ भि सजा नहि मिलेगि. क्या हमरे देश मे पुरुश और महिला मे इतना मत्भेद क्यु है ?

  • #5

    fawaznawaz (Wednesday, 27 June 2012 10:28)

    intrestingggggggg

  • #4

    nilesh (Wednesday, 13 July 2011 03:33)

    Very nice....

  • #3

    sharanjit kaur (delhi) (Wednesday, 13 July 2011 03:17)

    Thanks Samresh Ji for this great article. It is true that corruption can only be put to an end through spiritualism only.

  • #2

    preeti kaur (Wednesday, 13 July 2011 03:07)

    simply great..........

  • #1

    ram prasad, mirzapur up (Wednesday, 13 July 2011 03:06)

    bahut achha lekh hai