Readers/Visitors : Hit Counter

Rev. Samresh Kumar Ji
Rev. Samresh Kumar Ji

आनंद

हिन्दी आध्यात्मिक लेख

लेखक : श्री समरेश कुमार जी, जमशेदपुर, झारखण्ड


"आनंद" शब्द सिर्फ सुन कर हीं कितना सुकून महसूस होता है और अगर ये "आनंद" जीवन में प्रवेश कर जाए तो फिर बात हीं क्या! वैसे कौन नहीं चाहता की उसका जीवन भी आनंदमयी हो परन्तु ये "आनंद" है क्या और इसकी प्राप्ति होती कैसे है ये बड़ा हीं अजीब सवाल है. 
       

       आम आदमी की जिंदगी में ढेरों परेशानियां होती है जैसे- नमक है तो तेल नहीं, तेल है तो पानी नहीं, पानी है तो आटा नहीं, वगैरह वगैरह .... आम आदमी इन जरूरतमंद भौतिक सामग्रियों के पीछे हीं भागते - भागते   अपनी सारी की सारी जिंदगी व्यतीत कर देता है. उसे "आनंद" रेगिस्तान के फूल की तरह लगता है. 


कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बहुत रईस होते है, रुपये-पैसे, हीरे-जवाहरात से भरे पड़े होते हैं; फिर भी अगर उनसे जाकर पूछो तो सैकड़ों शारीरिक परेशानियां गिनवाने लग जाते है. मतलब "आनंद" से इनका भी दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं. 


तो क्या पूरे विश्व में आनंदित कोई है हीं नहीं?
नहीं ऐसा नहीं है.


         मेरे घर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर हीं एक चेशायर होम है, जहां पर स्पेशल बच्चे रहते हैं. न्यूज़ पेपर में पढ़ा था इनके बारे में. समझ में नही आया कि आखिर क्या बात है, इन्हें स्पेशल क्यों कहा गया है? जाकर मिलने कि इच्छा हुई. प्रोग्राम बना, संगत के कुछ युवा भाई-बहनों के साथ वहाँ जा पहुंचा. जाकर देखा कि उनमें से कई देख नहीं सकते, कई सुन नहीं सकते, कुछ बोल नहीं सकते और कई तो ऐसे हैं जो कि बस लेटे रहने के लिए हीं मजबूर हैं, वो अपने हाथों से अपना निवाला तक नहीं उठा सकते. देख कर मन में अजब सी टिस लगी; मन हीं मन ईश्वर से शिकायत कर बैठा - हे प्रभु ! ये मासूम बच्चे हैं, क्या कसूर है इनका? क्यों दी है इन्हें ये तकलीफ भरी जिंदगी? दुनिया के सारे दुःख, मुझे इनके दुःख के सामने छोटे दिखाई पड़ने लगे.


इधर मैं इनकी तकलीफों से परेशान हो रहा था और उधर वो तो बस मुस्कुराये ही जा रहें थे. जो देख सकते थे वे हमें अपने बिच पाकर खुश हो रहें थे, जो चलने - फिरने लायक थे वो खड़े होकर हमारे साथ नाचने लगें, मुस्कान सभी के चेहरों पर साफ़ झलक रही थी. दुःख और क्लेश का तो दूर - दूर तक नामों निशाँ तक ना था. उनमें से एक गा सकती थी, जब उसे गाने के लिए कहा गया तो वो अपने दोनों हाँथ जोड़ कर बड़े हीं मासूमियत के साथ गाने लगी- "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वाश कमजोर हो ना" ; सभी बच्चे अपने - अपने हाँथ जोड़ कर इस प्रार्थना में साथ देने लगें. 
मैं उस वक़्त के फिलिंग्स को शब्दों में बयान नहीं कर सकता. हमारी आँखें नम हो गयी थी. समझ में आ गया था की इन्हें स्पेशल क्यों कहा जाता है. जहां एक ओर अगर किसी को ज़रा सी खरोंच भर आ जाए तो वो पूरा का पूरा आसमान सर पर उठा लेता है, यहाँ तक की वो परमात्मा को भी कोसने से बाज़ नहीं आता, वहीं दूसरी ओर ये लाचार बच्चे जिन्हें सैकड़ों शारीरिक पीड़ाएं हैं मगर ये दुखी नहीं हैं, ये परमात्मा को कोस नहीं रहें हैं, बल्कि उनका शुक्रियाअदा कर रहें हैं और आनंद के उस चरम सीमा पर जा पहुंचे हैं जहां दुःख और क्लेश कभी इन्हें छू भी नहीं सकती. ये खुश हैं क्यूँकी इन्होने अपना सबकुछ ईश्वर को अर्पण कर दिया है. 


जब ये बात मेरे समझ में आयी तब झट से मैंने ईश्वर से मन हीं मन की गयी शिकायत को वापस लिए और क्षमा याचना की. सच हीं कहा गया है,  आनंद का सबसे बड़ा स्रोत - "जैसी भी हो परिस्थिति एक सी हो मनोस्थिति".

"हर ख़ुशी हांसिल हो जाती है जब तेरी मेहर-ए-नज़र होती है.
ना जाने क्यों पड़ जाता हूँ किसी भ्रम में जबकि तेरी इनायत तो हर बार मेरी तरफ होती है".

 

 

 


Comments: 0