नाम : श्री राम कुमार सेवक जी


दिल्ली

 

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संतोष पर व्यवहारिक चिंतन

लेखक : श्री राम कुमार सेवक जी (दिल्ली)


इस सम्बन्ध में चिंतन करने पर मुझे एक प्रसंग ध्यान में आता है.

प्रसिद्ध कवि विवेक 'शौक' जी ने एक बार बताया की लगभग तीस वर्ष पहले एक श्रद्धालु मिठाई लेकर, अपने सदगुरु की शरण में आया. उसका बच्चा भी उसके साथ था. सदगुरु व् उनके आस-पास उपस्थित लोगों ने श्रद्धालु से पूछा की मिठाई लाने का प्रयोजन क्या है? श्रद्धालु ने बताया की लड़का फेल हो गया है - इसलिए मिठाई लाया हूँ.

यह सुनकर लोग हंस पड़े क्योंकि फेल होने पर मिठाई खिलने की परंपरा नहीं है. फेल होने वाला तो एक कोने में छिप जाता है ताकि लोगों के उपहास का पात्र न बनना पड़े लेकिन यहाँ एक ऐसे श्रद्धालु से साक्षात्कार हो रहा था, जो छिपकर तो बैठे नहीं बल्कि (इसके विपरीत) मिठाई लेकर सदगुरु को धन्यवाद् देने चले आये.

इसका कारण उन्होंने यह बताया की जब यह हर साल पास होता था तो वह गुरु की कृपा थी, इस बार यदि यह पास नहीं हुआ तो यह भी तो गुरु की कृपा है. पहले भी उन्ही का धन्यवाद था, अब भी उन्हीं का धन्यवाद है.

यदि श्रद्धालु की अवस्था वास्तव में इसी प्रकार की है तो फिर तो पास-फेल एक जैसे हो गए. निरंकारी बाबा जी के शब्दों में, - जैसी भी हो परिस्थिति, रहे एक सी मनोस्थिति. शायर साहिर लुधियानवी के अनुसार -
             गम और ख़ुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,
             मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया.

यह बहुत ऊंची अवस्था है. यह तो बेशर्त संतोष है. ख़ुशी अथवा संतुष्टि मिलने पर आदमी संतोष का अनुभव करता है. परीक्षा में मनोवांषित सफलता मिल गायी, संतोष है. डी.डी.ऐ. में मकान निकल आया, संतोष है. बेटी की सही जगह शादी हो गयी संतोष है. अच्छी जगह नौकरी मिल गायी, संतोष है. सांसद बन गए, संतोष है. मंत्री बन गए संतोष है - इस सूची को चाहे जितनी बढ़ाते जाईये. मनोनुकूल परिणाम मिलने पर कोई भी संतोष हो सकता है, उसके लिए प्रयास करने की आवश्यकता नहीं.

ऊपर जितने भी प्रकार के संतोष बताये गए हैं, वे क्षणिक हैं. पहली परीक्षा में मनोवांषित सफलता मिल गयी, संतुष्टि मिल गायी, अगली परीक्षा में फेल हो गए, असंतुष्ट हो गए. डी.डी.ऐ. में मकान निकल आया, संतोष है, लेकिन एरिया, अच्छा नहीं मिला तो असंतुष्ट हो गए, बेटी की शादी सही जगह हो गायी, संतुष्ट हैं, लेकिन दामाद को असाध्य रोग है, जो बाद में पता चला, असंतुष्ट हो गए. सांसद बन गए संतोष है लेकिन लोकसभा ही भंग हो गायी, असंतुष्ट हो गए. मंत्री बन गए संतोष है लेकिन घोटाले में फँस गए, इस्तीफ़ा देना पड़ा तो असंतुष्ट हो गए.

क्षणिक संतुष्टि अथवा संतोष ऐसी नाव की भांति है जो लहरों के इशारों पर उलटती-पलटती रहती है. जिधर भार बढ़ा उधर से ही डूबने लगी.

वास्तविकता यह है की वर्तमान युग संतोष का नहीं है. आज जो सन्तुषट   है वह तो पिछड़ा अथवा अप्रासंगिक कहलाता है.

'जिसको कछु न चाहिए सोई शहनशाह', कहना-सुनना आसन है लेकिन घर का बच्चा यदि कह दे की मुझे कुछ चाहिए ही नहीं. स्कूल जाना बंद, तो माता पिता की अध्यात्मिक पकड़ चाहे जितनी भी गहरी क्यों न हो, इसे स्वीकार नहीं कर पाएंगे क्यों की बच्चे का भला-बुरा तो उन्होंने ही सोचना है.

छात्रावस्था के दिनों में यार-दोस्त एक ऐसे व्यक्ति का प्रसंग सुनाया करते थे जो आराम से चारपाई पर लेता था. कोई कर्मठ योद्धा उसके पास आकर बोला - "कुछ मेहनत करो, क्यों यूं ही लेटकर समय बर्बाद कर रहे हो?" वह (लेटा  हुआ) व्यक्ति बोला - "मेहनत करने से क्या होगा?" योद्धा बोला - "अच्छा खासा कारोबार खड़ा हो जायेगा." वह  व्यक्ति बोला - "कारोबार खड़ा होने से क्या होगा?" "तुम्हारा बड़ा नाम हो जायेगा," योद्धा बोला. "नाम होने से क्या होगा?" वह बोला. "तुम यशस्वी होंगे." योद्धा बोला. "यशस्वी होने से क्या होगा?" वह बोला. "तुम्हारा कारोबार बहुत ज्यादा फैलेगा." योद्धा बोला. "फिर क्या होगा?" वह बोला. तब तो दो ही चीज़ें होंगी - "सुख व् आराम" योद्धा ने संतुष्टि से कहा क्यों की लेटे हुए व्यक्ति द्वारा निरंतर किये गए प्रश्नों से उसे यह एहसास हो गया था की उसके तर्क सही दिशा में जा रहे हैं. लेकिन यह सुनकर वह उदास हो गया , जब उस लेटे हुए आदमी ने कहा की मैं अब भी तो सुख व् आराम में ही हूँ फिर इतनी भाग-दौड़ करने की क्या आवश्यकता है?

इस दुनिया में रहने वाला कोई भी व्यक्ति उस व्यक्ति के तर्कों से संतुष्ट हो जायेगा लेकिन उसका समर्थन  कोई भी नहीं करेगा क्यों की उस लेटे हुए व्यक्ति से निक्कमेपन का सन्देश निकलता है. इसके बावजूद उसकी संतुष्टि को चुनौती नहीं दी जा सकती. वह चारपाई पर आराम से लेटा है, चैन की नींद लेने की और अग्रसर है, उसके संतोष को हम कैसे चुनौती देंगे? उसकी अपनी अनुभूति है और उसे उस अनुभूति को स्वीकार करने की पूरी स्वतंत्रता है.

उपर्युक्त उदहारण में जो संतोषी है वह स्वीकार्य नहीं है, जो दौड़ रहा है, वही स्वीकार्य है क्यों की मानव योनी कर्म योनी है.

अबसे 25 -30 साल पहले जिसे सरकारी नौकरी मिल जाती थी, वह बहुत सफल माना जाता था. उस नौकरी को सुरक्षित रखने में ही उसका जीवन व्यतीत हो जाता था. आज का युवा एक नौकरी लेता है और तुरन्त उससे ऊंची नौकरी की तलाश शुरू कर देता है. एक छोड़ता है, दूसरी लेता है. दूसरी के बाद तीसरी. तीसरी के बाद चौथी, चौथी के बाद पांचवी यह कर्म चलता रहता है. उसे कोई कुछ नहीं कहता क्यों की हर नयी नौकरी में उसकी तनख्वाह का पैकेज बढ़ जाता है.

अब से बीस-तीस साल पहले यह चलन आम था, जिसके अन्तरगत इन्सान कहता था - मुहब्बत एक से होती है, हजारों से नहीं. अभी तो मुहब्बत के भी नए-नए कीर्तिमान बन रहे हैं. एक के बाद - दूसरी, दूसरी के बाद - तीसरी. स्त्री के सन्दर्भ में - एक के बाद - दूसरा, दूसरे के बाद - तीसरा.

अक्षत कौमार्य का युग पीछे छूट चुका है अब तो लोग साफ़-साफ़ कहते हैं - "मैं राम नहीं हूँ तो फिर क्यों उम्मीद करूँ सीता की.'

यह सपष्टता प्रशंसनीय है परन्तु यह अवस्था प्रशंसनीय नहीं है.  अविश्वास के धरातल पर बना रिश्ता टिकाऊ नहीं हो पायेगा. वह गृहस्थी भी आनंददायी नहीं होगी.

व्यावहारिकता में यह युग संतोष के विरुद्ध है लेकिन कहीं तो रुकना ही होगा. हमेशा तो दौड़ नहीं सकते. हर दौड़ के बाद विश्राम की आवश्यकता पड़ती है. संतोष ही वह बिंदु है जहाँ मन-बुद्धि विश्राम पाते हैं..

यही कारण है की कबीर दास जी ये पंक्क्तियाँ आज भी यथार्थ लगती हैं और स्वीकार की जाती हैं -

गोधन, गजधन, बाजधन और रतन धन खान,
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरी सामान.


कहते हैं की गायों का धन, हाथियों का धन, घोड़ों का धन और चाहे रत्नों की खान ही क्यों न मिल जाएँ, संतोष इतना बड़ा धन है, जिसके सामने ये सब धूल के सामान है.

मुझे तो दास रूपये भी धूल के सामान नहीं लगते, गाय-हाथी-घोड़े तो बहुत बड़ी-बड़ी चीजें हैं. संसार में कोई भी काम धन के बिना नहीं होता. पदार्थों की मात्रा जितनी-जितनी घटती जाती है, उतना-उतना उनका दाम बढ़ता जाता है. दाम बढ़ने से मंहगाई बढ़ती हैं. मंहगाई बढ़ने से धन की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है. तब और धन कमाना पड़ता है.

ऐसी अवस्था में रहकर संतोष पर चिंतन कैसे किया जाये? मगर जीवन की मजबूरी है, संतोष पर चिंतन जरूरी है क्यों की विश्राम तो वहीँ मिलेगा -

रात को सोते समय बिस्तर पर जब होता हूँ. सुमिरन करता हूँ तो संतोष के दीदार होते हैं. उस समय धन आदि का कोई चिंतन नहीं होता. सुमिरन के उस क्षण में  कई बार यह भी एहसास होता है कि यदि इस समय शरीर की यात्रा पूरी हो जाती है तो कोई पश्चाताप नहीं होगा क्यों की इस समय वो कुछ भी मेरे पास नहीं है, जिसे पदार्थवाद अथवा संसार कहा जाता है.

अगले दिन जब उठता है तो एक और लक्ष्य मेरे सामने होता है, जिसे हासिल करना होता है. उस समय  कर्म व् कोशिशों पर पूरा ज़ोर होता है. हासिल हो गया तो - ख़ुशी. यदि हासिल नहीं हो पाया तो भी कोई गम नहीं क्यों की मेरा कर्त्तव्य तो प्रयास करना ही है, उपलब्धि मिल पाना अथवा नहीं मिल पाना तो परमात्मा की कृपा पर निर्भर है. यह विचार पुन: संतोष से भर देता है. यह संतोष पुन: विश्राम देता है. अगले दिन का सूरज पुन: नयी आशा को  साथ लेकर आता है और मैं पुन: कर्म की और चल पड़ता हूँ. वर्षों से यही कर्म चल रहा है.

वास्तव में संतोष कर्म से मुंह मोड़ना नहीं सिखाता इसलिए प्रगति में किसी प्रकार भी बाधक नहीं बनता. यह तो इर्ष्या से बचकर प्रयास करते रहने की प्रेरणा इसी रूप में  देता है की अपनी शक्ति अपनी लकीर बड़ी करने में लगाओ. दूसरे की लकीर मिटने के लिए अपनी शक्ति व्यर्थ मत करो. कोशिश के बाद जो फल मिलता है उसे प्रभु का प्रसाद समझकर स्वीकार करो.

कई बार ऐसा भी होता है की पूरी कोशिश करने के बावजूद पूरी सफलता नहीं मिलती, इस अवस्था में संतोष का भाव हमें हताशा-निराशा-अवसाद (depression ) से बचाता है.

संतोष यथार्थ को सहज ढंग से स्वीकार करने का भाव है. संतोष कर्म या कोशिश छोड़ने का नाम नहीं बल्कि आसक्ति से बचकर अध्यात्म पर आधारित कर्ममय जीवन जीने का नाम है.

यह यथार्थ हमारे सामने सपष्ट है की हर उपलब्धि का अंत तो एक ही जैसा है. जो बहुत सफल और प्रसिद्द होते हैं, कभी यदि उनके व्यक्तिगत जीवन में झांककर देखा जाए तो पाएंगे की शिखर से उतरने के बाद वे प्राय: पुराने सुनहरे दिनों की याद करते हुए दुखी होते रहते हैं. ऐसे लोग प्राय: वर्तमान को ढूँढकर उन्हें हवा देते रहते हैं, दूसरी तरफ संतोषी व्यक्ति हर अवथा में सहज और सुखी रहता है, इसलिए संतोष को सबसे बड़ा धन माना गया है, क्योंकि यह कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ता. न तो इसे कोई छीन या चुरा सकता है, न ही इसका बंटवारा हो सका है. यह जीवन में किसी प्रकार की बाधा भी उत्पन्न नहीं करता.

पूरे चिंतन के पश्चात् अंतत: यही निष्कर्ष निकलता है की -

  • संतोष एक मानसिक अवस्था है, इसे किसी से खरीदा, बेचा अथवा उधार नहीं लिया जा सकता.
  • यह उत्तराधिकार में प्राप्त अवस्था भी नहीं हैं. यह सबकी अपनी-अपनी अवस्था है. पिता की अपनी है, संतान की अपनी.
  • संतोष मुक्ति की अनिवार्य शर्त है. यदि असंतुष्टि अथवा कोई चाहत शेष रह गायी तो पुन: जन्म लेना होगा, जो की भटकन की नयी यात्रा की शुरुआत है.
  • संतोष अकर्ममन्यता  का नाम नहीं है बल्कि निष्काम कर्म के परिणामस्वरूप जो फल प्राप्त हो रहा है, उसे ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करने का नाम है.
  • संतोष में हर परिस्थिति में प्रभु का धन्यवाद प्रकट करने का भाव सदा वर्तमान रहता है. इस कारण संतोषी व्यक्ति 'तेरा भाणा मीठा लागे' को व्यवहार में चरितार्थ करते हुए आदर्श भक्त का जीवन जीता है.

आईये संतोष को कर्मश: अपने जीवन का अंग बनाकर बेचैनी, निराशा व् हीन भावना से छुटकारा पाकर मानव जीवन का आनंद लें.

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