परिवार का आधार - टीम भावना व् परस्पर प्यार

 

जब हम पैदा हुए तो बिलकुल अकेले | जिसके गर्भ से हम जन्मे वह हमारी माँ कहलाई, जिसने हमें और हमारी माँ को संरक्षण दिया, वह हमारा पिता| उस माँ के गर्भ से जितने भी बच्चे उत्प्पन्न हुए वे हमारे भाई - बहन कहलाए, इस प्रकार हमारे परिवार का निर्माण हुआ | 

 

इस आधार पर देखें तो परिवार की आधारशिला (foundation) है - रक्त सम्बन्ध (blood relation) लेकिन यह सतही (surface/top) निर्णय (Decision) है | 

 

भाई - बहनों  में परस्पर (mutual) प्यार न हो तो वे झगड़ने लगते हैं और मतभेदों की स्तिथि (situation) में, आत्मनिर्भर (self-dependent) होते ही वे अलग हो जाते हैं | प्राय: माता-पिता अपनी संतानों को जोड़े रखने की कोशिश करते हैं परन्तु जहाँ अपनी-अपनी पड़ जाती है, वहाँ की टूटन कोई रोक नहीं सकता|

 

स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रसंग है| जब उनके पिता जी की मृत्यु हुई तो परिवार पर जैसे विपतियों (adversity/calamity/problems) का पहाड़ टूट पड़ा| खाने-पीने के भी लाले पड़ गए| कहते हैं की एक बार सब्जी में सिर्फ एक आलू था| सारे भाई बहन अपनी माता की छत्रछाया में खाने बैठे तो हर किसी ने वह आलू दूसरे के लिए छोड़ दिया| सब्जी के पानी से ही अपना-अपना काम चला लिया| उनका परस्पर प्रेम देखकर उनकी माँ ने कहा की तुममें आपस में इतना अधिक प्यार देखकर गरीबी भी तुम्हें ज्यादा दिन तंग नहीं कर सकती| समय बदला उनके अच्छे दिन भी आ गए|

 

विवेकानंद तो इस सीमा से ऊपर ही उठ गए क्यों की सन्यासी हो गए थे उनका लक्ष्य था - जन-जन में बसे प्रभु को प्रसन्न करना | इस प्रकार पूरी दुनिया ही उनका परिवार हो गयी थी|

 

एक परिवार राजा दशरथ का भी था| तीन पत्नियाँ, उनसे चार पुत्र| एक पुत्र के मोह (attachment) में राजा दशरथ ने प्राण त्यागे| एक पत्नी राजा  दशरथ की बात मानने को तैयार ही नहीं थी अंतत: रजा को प्राण त्यागने पड़े|

 

बात न मानने के कारण पति या पत्नी की जान चली जाये यह घाटे का सौदा है| अपनी ego (अहंकार) को त्यागकर बात मान लेनी चाहिए| लेकिन परिवारों में अक्सर ऐसा चलता रहता है| Ego ही प्राय: हावी हो जाती है| आजकर तो परिवार रूपी रथ के घोड़े प्राय: अपनी-अपनी दिशाओं में दौड़ते हैं जिससे अन्संतुलन व् टूटन आम है|

 

राजा  दशरथ की तो तीन पत्नियाँ थीं| एक ही ने उनकी बात नहीं मानी, शेष ने तो मान ली थी| पुत्र भी उनके अनुशासन (discipline) को मानते थे, इस प्रकार संतुलन (balance) काफी हद तक तो कायम रहा| आज तो हालात ऐसे हैं की एक पति और एक पत्नी, फिर भी विवाद (controversy) और अंतत: तलाक| बच्चों की स्तिथि ऐसे होती है जैसे - दो मुल्लाओं में मुर्गी, न रोते बनता है न हँसते| सिर्फ वकील ही लाभ में रहते हैं, बाकी तो दोनों ही घाटे में रहते हैं और बच्चे तो बेचारे अनाथों जैसे हो जाते हैं |

 

मेरे एक मित्र हैं| ऊंचे दर्जे के साहित्यकार (author, creative writer) और कवि (poet) | सदैव (always) मुझे प्यार, सहयोग (support) व् प्रोत्साहन (encouragement) ही दिया| मुझसे लगभग 10 साल ज्यादा उम्र है| शादी मुझसे लगभग 5 साल बाद की| जिसे ट्यूशन पढ़ाते थे उसी से शादी की| पत्नी भी काफी सुन्दर थी | पाँच-सात साल तो यूँ ही सहज गुज़र गए जैसे दिन के बाद रात लेकिन बाद में तनाव व् झगड़े का सिलसिला चला और दोनों, बच्चों को अधर में लटकता छोड़कर अलग-अलग हो गए| बच्चे पिता के पास रहे| पत्नी ने दूसरी शादी कर ली| पति ने भी बाद में दूसरी शादी कर ली| धीरे-धीरे लड़का बड़ा हुआ और जैसे-जैसे उसे समझ आती रही वह विद्रोही (rebelious / defiant) होता गया| अंतत: वह अलग हो गया और वह किशोर (juvenile / teenager) अब अकेला जीवन के संघर्ष झेल रहा है| उसके साहित्यकार (author) पिता ने भी पहले ऐसा ही किया था | कर्म-फल का सिद्धान्त सामने है| जिस संतान पीड़ा को मेरे मित्र के माता-पिता ने झेला था, अब उसे झेलने की उनकी बारी है|

 

मित्र पुत्र के लिए चिंतित रहते हैं और मुझसे कुछ करने को कहते हैं लेकिन न मैं कुछ कर पा रहा हूँ न ही वे|

 

वास्तव में परिवार एक टीम की भाँती होता है| परिवार के सब सदस्यों में परस्पर (mutual) तालमेल (coordination)होना चाहिए| आपस में तालमेल बना रहता है तो वे अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं| यदि तालमेल नहीं रहता तो काम अगर हो भी जाए, तो पूर्ण सफलता नहीं मिल पाती| 

 

परिवार की टीम का कप्तान है - पति |    उप्कत्तान है - पत्नी |    बच्चे टीम के सदस्य हैं | उनकी संख्या पर मत जाइए, जितनी संख्या ज्यादा होगी जिम्मेदारी (responsibility) भी उतनी ही ज्यादा होगी| बस यह समझ लीजिए की टीम जितनी छोटी होगी, उसे संभाल रखना भी उतना ही आसान होगा| टीम अगर बड़ी होगी तो तालमेल बनाये रखने के लिए साम-दाम, दंड-भेद आदि सभी नीतियों का प्रयोग करना पड़ेगा| तब भी संतुलन कायम रहे तो समझिए जैसे किसी निर्माता-निर्देशक की फ़िल्म सुपरहिट हो गयी| 

 

प्रचार माध्यमों में जितना कुछ पढ़ने-सुनने को मिलता है उसके हिसाब से script राईटर सलीम खान की पारिवारिक टीम बहुत मजबूत दिखाई देती है| उनकी पहली पत्नी  हिन्दू है और बाद में मुसलमान हो गयी: धर्म के ऊपर प्यार को महत्ता दी| दूसरे  शब्दों में कहें तो प्यार को ही धर्म बना लिया| सलीम खान ने बाद में मशहूर नृत्यांगना (dancer) अभिनेत्री (actress) हेलेन से भी शादी की | हेलेन जन्म से ही ईसाई हैं| हो सकता है वे भी अब मुस्लिम हो गयी हों| इसमें हैरानी की बात इसलिए नहीं हैं क्योंकि इस प्रकार की परिस्थितियों में प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म हो जाता है| सलीम खान के तीन बेटे फिल्मों में सक्रिय हैं| पहली बहु पंजाबी (अरोड़ा) हैं| एक लड़के की प्रेमिकाएं ही काफी रही हैं, पहली प्रेमिका सिन्धी, दूसरी मुस्लिम, तीसरी बंगाली, चौथी शायद ईसाई धर्म से सम्बंधित होंगी, ऐसा अनुमान है| सलीम खान के घर में एक बेटी और भी है, वह शायद हिन्दू है, जिसे उन्होंने गोद ले रखा है| संख्या व् धार्मिक विभिन्नता की दृष्टि से देखें तो मतभेदों की प्रयाप्त गुंजाईश है लेकिन फिर भी परिवार चल रहा है और बहुत बढ़िया चल रहा है तो इसका एक मात्र कारण जो मुझे नज़र आता है, वह यह है की परिवार रुपी टीम के कप्तान सलीम खान का अपने परिवार पर पूरा नियंत्रण हैं| मेरी दृष्टि में यह परिवार आदार्श तो नहीं लेकिन बेहतर ज़रूर है| उनकी कुछ बातें अनुकरण में लायी जा सकती हैं|

 

यहाँ ध्यान देने की बात यह है की इस परिवार को हिटलर वाले रूख से नियंत्रित (control) नहीं किया जा सकता क्योंकि परिवार के लगभग सभी सदस्य की रुचि-अरूचि (likes/dislikes) का पूरा पता उन्हें होगा तथा कुछ मामलों में उन्होंने अपनी टीम को पूरी आज़ादी दे रखी होगी| उन मामलों में वे दखल देने से बचते होंगे| इस सबका प्रभाव यह होगा की उनके निर्णय का सम्मान उनका पूरा परिवार करता होगा| मुझे लगता है की उनका परस्पर प्रेम बहुत प्रबल है जिसके कारण तालमेल बनाना आसान हो जाता है|  

 

यह इक्कीसवीं सदी है| हर इंसान पदार्थों की दौड़ में दौड़ रहा है| आदमी अपनी ज़रूरतों से कई गुना ज्यादा इकट्टा कर रहा है| उसे अच्छी तरह मालूम होता है की इकट्ठी की गयी उन चीजों में से कई चीज़ों का उपयोग वह व्यक्तिगत तौर पर बिलकुल नहीं कर पायेगा, इसके बावजूद काफी पदार्थ वह अपने परिवार के लिए इकट्ठे करता है लेकिन होता यह है की लगातार दौड़ने के कारण उसके पास परिवार के लिए समय ही नहीं बचता| 

 

आपस में भावनाएं सांझी नहीं हो पाती| बेटे किसी प्रेमिका को अपना बना लेते हैं और बेटियाँ किसी प्रेमी को| पत्नी भी कई बार किसी और के साथ हो जाती है| उस अवस्था में ऐसे टीम का कप्तान निरीह और दया का पात्र हो जाता है| जिस परिवार व् प्रतिष्ठा के लिए वह पदार्थों की दौड़ दौड़ता है वह परिवार ही ख़त्म हो जाता है तो फिर पदार्थों की दौड़ निरर्थक सिद्ध होती है |

 

ज़रुरत एक-दूसरे को समय व् सहयोग देने की ही है|  हर वर्ष जब वार्षिक निरंकारी संत समागम का प्रारम्भ होता है तो प्राय: निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी अपने अनुयाईयों को निर्देश देते हैं की 'दूसरे को पहल दें'| इन चार शब्दों की गहराई बहुत ज्यादा है| पहला शब्द तप-त्याग का प्रतीक है| सुविधाओं के मामले में परिवार के अन्य सदस्यों को पहल देने से परिवार रुपी टीम मजबूत होती है| गृहस्वामी के लिए तो यह कार्य अनिवार्य ही है| दूसरे को पहल देना परस्पर  प्रेम व् सहयोग बढ़ाता है| परिवार के अन्य सदस्यों की ज़रूरतों का ज्ञान व् उन्हें पूरा करने की साफ़ नियत होनी चाहिए| 

 

मैंने संव्य जो महसूस किया है, उसमें पाया है की सुबह की शुरुआत यदि अध्यात्म से हो, भजन-सुमिरन से हो तो मनों में शान्ति व् पावनता का संचार होता है, जिससे सहयोग व् प्रेम भाव की स्थापना सहज व् सरल हो जाती है| शान्ति व् पावनता की आधारशिला पर जो व्यवहार शुरू होगा वह निश्चय ही परिवार रुपी टीम को संतुलन व् सफलता देगा, ऐसा मेरा अनुभव  है|

 

वास्तव में परिवार में भी टीम भावना के अनुकरण-अनुसरण की आवश्यकता है| 

 

 


Views / Remarks

Aap ji ka lekh bahut bahut bahut aur bahut hi achha hai. Aap ji ke liye meri Babaji se bus yahi prarthana hai ki "Babaji Aap ji ki kalam ko yu hi shakti aur samartha pradan karte rahen aur Aap ji aise hi sundar-sundar lekh likhte chale jayen jis se hum sabhi ko laabh pahunchta rahe".

Samresh Kumar, Jamshedpur, Jharkhand

aasha hai ki is lekh ko parhne k baad kaafi logon ko apne parivaar ko sambhaalne mein sahayta milegi. Jo ki aaj ke samay mein ati aavashyak hai.

Arun, Mughal Sarai, UP

 

parivaar ke baare aapka lekh parhkar bahut achha laga.

vinayak, navi mumbai, mah

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