काम और राम में समन्वय

हिन्दी आध्यात्मिक लेख ---Hindi Spiritual Article

लेखक : श्री राम कुमार 'सेवक' जी

हिन्दु धर्म में मानव जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । धर्म वह है जिसे व्यक्ति धारण करता है, अर्थात परमात्मा । यह एक विडंबना ही है की व्यक्ति परमात्मा के बदले तरह-तरह के संगठनों व् समूह विशेषों को धर्म मान बैठा है । समूहों अथवा संगठनों को धर्म मान लेने के कारण ही आज धर्म का अर्थ इतना संकुचित हो गया है । जिसे जोड़ने का कार्य करना था, उसी का नाम लेकर लोगों को तोड़ा  और लड़ाया  जाने लगा है । लेकिन धर्म में जिस पुरुषार्थ को सम्मिलित किया गया है, वह जोड़ने वाला कर्म है । रामचरित मानस में धर्म की इसी तरह से व्याख्या की गई  है : 

परहित सरिस धर्म नहिं  भाई,
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई । 
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दूसरा पुरुषार्थ है - अर्थ । यह जीवन की व्यवहारिक आवश्यकताओं का आधार है । इसका सामान्य अर्थ है - आर्थिक उन्नति, अर्थोपार्जन । गृहस्थ जीवन को सहजता व् सरलता से चलाने के लिए अर्थोपार्जन अनिवार्य है । इसके आभाव में वह न अपने ही शरीर का ख्याल रख पाएगा, और न ही अपने सांसारिक दायित्य का निर्वाह कर पाएगा । इसलिए हिन्दु  धर्म में अर्थ को भी जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है ।  इसे दुसरे सन्दर्भ में देखें तो ज्ञात होता है की हमारा जीवन अर्थपूर्ण या उदेश्यपूर्ण होना चाहिए, निरर्थक नहीं । ताकि जीवन सार्थक हो सके । इस प्रकार जीवन के सांसारिक पक्ष के साथ पूर्ण संतुलन को पुरुषार्थ का दूसरा अंग माना  गया है । 
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तीसरा पुरुषार्थ है --काम । काम वास्तव में हमारी उत्पत्ति का आधार है । यदि विपरीत लिंगियों में परस्पर काम भावना न हो तो सृष्टि का क्रम टूट ही जाए । इस सृष्टिक्रम को जारी रखने के लिए ही प्रभु ने मानव में काम भावना का वास किया । परन्तु यदि जीवन में यही प्रमुख हो जाए तो मनुष्य असंतुलित हो जाएगा । ठीक उसी तरह जैसे यदि जीवन में सिर्फ अर्थ का उपार्जन ही करता रहे या सिर्फ प्रभु का हे भजन करता रहे, तो वह अपने चारों पुरुषार्थ पूरे नहीं कर पाएगा । काम का एक अर्थ इच्छा या सुख की लालसा भी है । आज पूरी दुनिया में ऐंद्रिक सुख की यह लालसा  प्रमुख हो गई  है । 
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अपने ही देश में देखें, सर्वत्र काम का बोलबाला है । जहाँ, राम की जय बोली जा रही है, वहां भी किसी कोने में काम पाँव पसारे बैठा है। कहीं वह राजनीतिक लिप्सा का प्रतिरूप है तो कहीं धन सम्पति की कामना का रूप । रेडियो-टीवी ही नहीं शहर में जो पोस्टर या होर्डिंग्स लगे हुए हैं, वे भी हमारी कामनाओं और कामुकता को ही उभारना चाहते हैं । विज्ञापन चाहे ट्रक में उपयोग होने वाली बैटरी  का हो या मोबाइल फोन कम्पनियों का, उनके पात्र वही  हैं, जो आपकी काम भावना को लक्ष्य करके बनाए गए हैं, । हालाँकि जो लोग इन विज्ञापनों को बनाते हैं, वे कोई  असामाजिक तत्व नहीं हैं, बल्कि वे तो समाज के सम्मानित तथा जिम्मेदार लोग माने जाते हैं, इसके बावजूद काम वासना को ही उभारकर लाभ प्राप्त करने में लगे हैं । 
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चौथा पुरुषार्थ है - मोक्ष । मोक्ष है हमारी आत्मा का परमात्मा में समाहित हो जाना । बूँद सागर हो जाए यानि की आत्मा, परमात्मा हो जाए, अंश होने की बजाय । धर्म, अर्थ, काम तीनों से ऊपर की अवस्था है यह । यह पूर्णतः प्रभुमय हो जाने की अवस्था है। 
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हिन्दु धर्म के अनुसार सही क्या है? न काम त्याज्य है, न राम त्याज्य हैं । काम ही विभिन्न कलाओं का जन्मदाता है । यदि पुरुष का नारी के प्रति और नारी का पुरुष के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाए तो देखने-दिखाने का भाव ख़त्म तो चित्रकला, गायन, नृत्य, फैशन, सारे सिलसिले ख़त्म । यह न हो तो जीवन का श्रृंगार पक्ष ही ख़त्म हो जाए । तब तो यह दुनिया बहुत उबाऊ हो जाएगी । इसलिए काम का पक्ष रहे, लेकिन जीवन के चौथाई हिस्से का ही हिस्सेदार रहे ।  काम और राम में समन्वय होना अति आवश्यक है । 
Shri Ram Kumar 'Sewak' Ji
Shri Ram Kumar 'Sewak' Ji


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Comments: 5
  • #5

    Gurdeep Singh (Admin) (Saturday, 16 April 2016 06:51)

    Welcome Shri Ram Kumar 'Sewak' Ji, Thanks for sharing your writings. Keep blessing,

  • #4

    Ram Kumar Sewak (Saturday, 16 April 2016 06:15)

    Many-2 thanx for kind co-operation Gurdeep Ji-Dhan Nirankar Ji-

  • #3

    Geeta Batra (Friday, 15 April 2016 05:13)

    Hey Admin! you got good stuff on your site, this one was great...It was good experience to read religious Hindi article.

  • #2

    Ram Narayan Tripathi (Thursday, 14 April 2016 22:15)

    dharm ki baat karte hue Sex ka zikr theek nahin lagta

  • #1

    Manish (Thursday, 14 April 2016 22:13)

    This is awesome! (Hindi simple wali likho please)

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