बुरा जो देखन मैं चला

हिन्दी आध्यात्मिक लेख

लेखक : श्री राम कुमार 'सेवक'


संत कबीर जी ने कहा है - 

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बुरा जो देखन  मैं चला, बुरा न मिल्या कोय। 
जो मन  खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। 
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इस दोहे में बुरा देखने, चलने और फिर अपने मन के भीतर देखने का क्या मतलब है? कबीर जी का आशय आत्मविश्लेषण से है। आज तक जितने भी संत-महात्मा और महापुरुष हुए हैं, वे सभी आत्मविश्लेषण के पक्षधर रहे हैं। अपने को देखे बिना जग को नहीं देखा जा सकता । आत्मविश्लेषण से ही आदमी निरन्तर महानता  की ओर  अग्रसर होता है। लेकिन इस आत्मविश्लेषण की ज़रुरत क्यों पड़ती है?
हमारे जीवन में कई कार्य अनायास ही हो जाते हैं और कुछ के लिए हमें प्रयास करना पड़ता है। हमारे स्वाभाव में जो चीज़ें शामिल हो जाती हैं, वे अनायास ही होती रहती हैं, उनके लिए हमें प्रयास नहीं करना पड़ता। ये चीज़ें सकारात्मक भी हो सकती हैं और नकारात्मक  भी । उदाहरण के लिए हम सांस लेते हैं ।  सांस लेना हमारे जीवन के लिए एक आवश्यक क्रिया है, इसके लिए हमें प्रयास नहीं करना पड़ता। इसी प्रकार पलकें भी हम अनायास ही झपकाते रहते हैं, इसके लिए भी प्रयास की ज़रुरत नहीं पड़ती। यह सब जीवन की नैसर्गिक और आवश्यक क्रियाएं हैं, इनके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता । 
लेकिन कुछ और क्रियाएं भी ऐसी हैं, जो न तो नैसर्गिक हैं और न ही आवश्यक, पर उनके लिए भी प्रयास नहीं करना पड़ता । जैसे कुछ लोग आदतन गाली-गलौच करते हैं । वे कोई अच्छी बात कहें, उसमें भी अनायास ही अपशब्द आ जाते हैं, उन्हें पता भी नहीं चलता । बिलकुल निर्दोष भाव से वे ऐसे नकारत्मक कार्य करते हैं । लेकिन दूसरे उनकी ऐसी विकृतियों को महसूस करते हैं । ऐसी नकारत्मक प्रवृत्तियां किसी के भी हित  में नहीं होती । इन्हे पैदा करने के लिए तो कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, अनायास ही ये उत्पन्न हो जाती हैं और हमारे स्वाभाव में सम्मिलित हो जाती हैं, परन्तु इनसे छुटकारा पाने के लिए अवश्य ही प्रयास करना पड़ता है । कुछ प्रवृत्तियां ऐसी भी होती हैं जो हमारे स्वाभाव में शामिल नहीं होतीं, लेकिन जब वे दैनिक जीवन की अंग हो जाती हैं तो स्वाभाव में शामिल हो जाती हैं, जैसे कुछ व्यक्ति प्रात: की सैर शुरू करते हैं और फिर उसका नियम बना  लेते हैं । नियम बनाने  के लिए कुछ दिनों तक उनका पालन करने के लिए प्रयास करना पड़ता है । जब कुछ समय व्यतीत हो जाता है तो फिर ऐसे नियम हमारे स्वाभाव के अंग हो जाते हैं । प्रात: की सैर, व्यायाम, पूजा-ध्यान, ये सब जब नियमित जीवन के अंग हो जाते हैं, फिर उनके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता । स्वाभाव बन गया तो बन गया, वह फिर बदल पाना मुश्किल होता है । स्वाभाव जैसे-जैसे पुराना  होता जाता है, उसकी नींव उतनी ही गहरी होती जाती है। 
प्रवृति यदि सकारत्मक है तो उसे बदलने की ज़रुरत नहीं है। लेकिन नकारत्मक प्रवृत्तियों को अवश्य बदल देना चहिए। यह बदलाव जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही बेहतर है। जैसे अपशब्दों का प्रयोग आदि स्वाभाव में शामिल हो गया है, तो उसे यदि बचपन में ही बदल दिया जाए तो आसान है। जैसे-जैसे आयु बढ़ेगी, उसकी नीवं गहरी होती जाएगी । उस अवस्था में उसे बदलने के लिए उतनी ही ज़्यादा संकल्प शक्ति की ज़रुरत पड़ेगी । आयु बढ़ने के साथ-साथ संकल्प शक्ति कमज़ोर होती जाती है । 
इस तथ्य पर गौर किए जाने की आवश्यकता है की जिन प्रवृत्तियों को हम अन्य लोगों के लिए हानिकारक मानते हैं, उन प्रवृत्तियों के शिकार कहीं हम खुद तो नहीं हैं । इंसान प्राय: दूसरों की कमियों को तो एकदम पकड़ लेता है, जबकि संव्य अपनी कमियों को अनदेखा कर देता है । यह तब है जब की दूसरे की कमियों का हमारे जीवन पर उतना व्यापक असर नहीं पड़ता जितना की संव्य हमारी कमियों  का पड़ता है । इसलिए अपनी वास्तविकता से रू-ब-रू  होते रहना चाहिए । आत्मनिरीक्षण, आत्ममंथन अथवा आत्मविश्लेषण की प्रवृति यदि हमारे दैनिक जीवन का अंग बन जाए तो धीरे-धीरे यह हमारे स्वाभाव में सम्मिलित हो जाएगी । 
यह प्रवृति यदि स्वाभाव में शामिल हो गयी तो फिर जीवन में संतुलन बना  रहेगा । संतुलन बना  रहेगा तो संतोष बना  रहेगा । संतोष बना रहेगा तो शान्ति बनी रहेगी । शान्ति से आनंद तक पहुंचना सुगम है। 
कबीर दास जी ने इसी ओर  उन्मुख करने के लिए ही शायद उपर्युक्त दोहे में आत्मनिरीक्षण की ओर  प्रेरित किया है। 

 



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