श्री राम कुमार 'सेवक' जी 

मुख्य सम्पादक (अ) : www.maanavta.com


आशीर्वाद में झलकते संतोष और प्रसन्नता 

यह कैसा विचित्र संयोग (strange co-incidence) है की आध्यात्मिकता (spirituality) और आशीर्वाद, दोनों ही शब्दों की शुरुआत वर्ण 'आ' से होती है| दूसरे शब्दों में कहें, तो दोनों की एक ही राशि है| इससे स्पष्ट होता है की आध्यात्मिकता में आशीर्वाद का अहम् स्थान है|

 

अक्सर देखा जाता है की घरों में, स्कूल में या कहीं और जब बच्चे बड़ों का अभिवादन करते हैं या उनके चरण स्पर्श करते हैं, बड़े उन्हें आशीर्वचन कहते हैं| प्राचीन काल से कहे जा रहे वाक्य 'आयुष्मान भाव', 'चिरंजीवी भाव' आदि आशीर्वादों के ही सूचक हैं| स्त्री के संदर्भ में 'सौभाग्यवती भाव' आदि का प्रयोग आशीर्वचन के रूप में किया जाता है| आजकल इन संस्कृतनिष्ठ वाक्यों का प्रयोग थोडा कम हो गया है और उनके स्थान पर 'जीते रहो' और खुश रहो' आदि का चलन हो गया है, तो भी इनका भाव वही है|

 

आशीर्वाद देना और आशीर्वाद लेना दोनों ही संतोष (contentment) और प्रसन्नता (happiness) के विषय (subject) हैं| अगर कोई व्यक्ति आपसे प्रसन्न है, तब ही तो उसके मुख से आपके लिए आशीर्वाद भरे बोल फूटेंगे| दूसरी और, आशीर्वाद ग्रहण (receive) करने वाला भी अपने मन में संतोष का अनुभव करेगा| यह एक सकारात्मक स्तिथि (positive situation) है दोनों ओर प्रसन्नता का भाव है, असंतोष नहीं|

 

यहाँ यह भी उल्लेखनीय (mentioning) है की आशीर्वाद मौन (silence) के रूप में भी व्यक्त हो सकता है| आपने अगर किसी के ले कुछ अच्छा किया और उसने ह्रदय की गहराई से उस अच्छाई को महसूस किया, लेकिन इसका धन्यवाद् या आभार जताने के लिए उस वक्त सही शब्द नहीं सूझ सके, तो उसकी आँखें, उसके चेहरे का भाव, उसके होठों की मुस्कराहट से सब मिलकर आशीर्वाद का भाव ही हम तक पहुँचा रहे होते हैं| यहाँ शब्द तो नहीं हैं, पर हमें शब्दों की चाह किए बगैर बॉडी लैंग्वेज (body language) यानी हाव-भाव देखकर संतुष्ट हो जाना चाहिए| आशीर्वाद तो भावों की ही स्तिथि है, वहाँ शब्दों का असल में कोई काम नहीं है| यह भी ध्यान रखें की न तो हर कोई आशीर्वाद दे सकता है और न ही हर कोई आशीर्वाद ले सकता है| असल में, आशीर्वाद देने और आशीर्वाद लेने की क्षमता होना भी ज़रूरी है| क्षमता से तात्पर्य यह है की आशीर्वाद रुपी हमारे अकाउंट में कुछ बैलेंस (शेष) होना भी तो चाहिए| कहने का अर्थ यह है की अगर हमने अपने जीवन में किसी से आशीर्वाद लिया है, तब ही तो हम आशीर्वाद देने योग्य हो पाते हैं| अगर हमने कभी किसी से आशीर्वाद नहीं लिया तो किसी के लिए हमारे  मुंह से कोरे शब्द ही निकलेंगे, सच्चा आशीर्वाद नहीं| इसी तरह, आशीर्वाद-दाता के प्रति यह भरोसा होना चाहिए की इसका आशीर्वाद मेरा भाग्योदय कर देगा| इसके आशीर्वाद से मेरा जीवन वास्तव में संवर जाएगा| जब दोनों ओर से ऐसी स्तिथि होती है, तो ही असल में आशीर्वाद फलित (fruitful) होता है| जहाँ आशीर्वाद मौन में व्यक्त नहीं होता, यानि जहाँ कुछ शब्दों में आशीर्वाद दिया जाता है, वहाँ भी वे केवल शब्द नहीं होते| शब्दों के पीछे एक सकारात्मक भाव या सदिच्छा छिपी होती है| यह सकारात्मक भाव हमारा हौसला बढ़ाता है और सफलता के प्रति हमें आश्वस्त करता है| यह भी ध्यान रहे की जब आशीर्वाद का योग सत्कर्म के साथ होता है, तो सफलता ज्यादा दूर नहीं रहती| व्यक्ति अपना ध्येय (target) आसानी से प्राप्त कर लेता है|

 

कई बार लोग दूसरों से ज़बरदस्ती आशीर्वाद लेने की बात कह देते हैं|यानी जिससे आशीर्वाद लिया जाना है, उस व्यक्ति के प्रति उसके मन में न तो विश्वास होता है और न ही वैसा भाव| असल में वे आशीर्वाद नहीं चाहते, बल्कि किसी तरह से अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं| अक्सर राजनेता चुनावों के वक्त गली-मोहल्लों में घूमकर, हाथ जोड़कर लोगों से मांग करते रहते हैं की उन्हें जनता का आशीर्वाद चाहिए| असल में, उन्हें आशीर्वाद नहीं, वोट चाहिए होते हैं| बहरहाल, हमें ऐसे काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए, जिनसे हम किसी के आशीर्वाद के पात्र बन सकें| इसी तरह हम आशीर्वाद देने की क्षमता भी अर्जित कर सकते हैं और जीवन को सुखद व् सार्थक बना सकते हैं|

 

rksewak@yahoo.co.in 



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