आधुनिक युग में - आध्यात्म 

लेखक : श्री राम कुमार 'सेवक' जी 

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कालोनी के बाहर द्वार पर लिखा था - आपके पधारने हेतु धन्यवाद्| मैं सोच रहा था की यह वाक्य कालोनी में कुछ समय व्यतीत करके वापस लौटने वालों के लिए है|

 

इस धरा रुपी कालोनी में कुछ वर्ष रहकर मुझे भी लौट जाना है| जब मैं इस संसार से जाऊं तो यदि संसार कहे की - 'आपके पधारने का धन्यवाद' तो इस अवस्था में मैं आध्यात्मिक होने का दावा करने का हकदार हो सकता हूँ|

 

लोग कहते हैं की आध्यात्मिकता सत्य की खोज है| मैं इस बात से इस कारण सहमत नहीं हूँ क्योंकि खोज एक प्रक्रिया है, परिणाम नहीं है| खोज तब सार्थक होती है जब उसकी खोज कर ली जाये, जिसे खोजने  चले थे|

 

सिर्फ प्रक्रिया एक अधूरा शब्द अथवा भाव होगा| प्रक्रिया का मूल्याकन होता है परिणाम से| पेड़ का मूल्याकन फल से होता है| फल बताता है की पेड़ कौन सा है इसी प्रकार परिणाम बताता है की प्रक्रिया कितनी सार्थक अथवा निरर्थक थी|

 

मुझे लगता है की आध्यात्मिकता सत्य खोजने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि सत्य की प्राप्ति का परिणाम है. जब सत्य की प्राप्ति हो जाती है तो प्रक्रिया भी आध्यात्मिकता में समाहित हो जाती है| उससे पहले तो खोज, रास्ता भर है| मंजिल के बिना रास्तों की क्या महत्ता है?

 

मंजिल मिलती है तो रास्ते भी सार्थक हो जाते हैं इसी प्रकार सत्य  की प्राप्ति हो जाती है तो प्रक्रिया भी सार्थक हो जाती है| तभी  वह आध्यात्मिकता का अंग बन पाती है|

 

इक्कीसवीं सदी गति की प्रतीक है| वाहनों से लेकर विज्ञान के अनेकों अंगों तक, चाहे जहाँ तक भी नज़र दौडाएं, सर्वत्र गतिशीलता ही उजागर होती है|

 

इसके विपरीत आध्यात्मिकता ठहराव का नाम है| यह स्थितप्रज्ञता की अवस्था है| प्रभु रुपी शिखर पर पहुंचे और वहीँ ठहर गए| यह ठहराव मनोव्स्था का है, जीवन का नहीं| जीवन के समस्त क्रियाकलाप तो चलते रहते हैं, फिर भी ठहराव बना रहता है क्योंकि मन में, विचारों में, सोच में, गहराई बनी रहती है|

 

यहाँ आध्यात्मिकता व् इक्कीसवीं सदी में विरोधाभास लगता है जब की ये परस्पर मिले हुए हैं| आइए देखें की कैसे मिले हैं?

 

हर गति को विश्राम चाहिए| गति होती है विश्राम तक पहुँचाने के लिए| प्राय: गति के कारण थकान व् तनाव पैदा होता है| तनाव के कारण असंतुलन होता है| असंतुलन से अशांति होती है| अशांति से संघर्ष होते हैं| संघर्ष से आराजकता होती है और आराजकता से विनाश होता है|

 

इक्कीसवीं सदी में विनाश से बचें इसके लिए आध्यात्मिकता का अवलंबन चाहिए ही|

 

आध्यात्मिकता  ही इक्कीसवीं सदी को स्थायी विकास की सदी बना सकती है अन्यथा तनाव, अशांति व् असंतुलन विनाश अवश्यम्भावी है|

 

इक्कीसवीं सदी में साधनों की कमी नहीं है, कमी तो साधना की है| साधना चाहिए विशालता की, उदारता की, सत्य के प्रभाव की, जियो और जीने दो के भाव की|

 

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