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पैसा और प्रसन्नता

लेखक : श्री राम कृषण ‘मानव’, चित्रकूट

 

पैसा और प्रसन्नता जीवन के लिए दोनों ही महत्वपूर्ण हैं. दोनों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है. अधिकाँश लोग यह सोचते हैं की पैसा आ जाएगा तो पीछे-पीछे प्रसन्नता भी आ ही जाएगी. यही कारण है की इंसान पैसे को प्राथमिकता देता है.

 

एक परिवार है, जहाँ पति-पत्नी अपने बच्चों के साथ आनन्दपूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं. छोटा सा मकान मामूली सी आमदनी, फिर भी परिवार प्रेमपूर्वक रह रहा है. बेटे जब बड़े हुए तो उनकी बहुएं भी आ गयी. वे अपने साथ मायके से अपनी अलग अलग और महत्वकांक्षी विचारधाराएँ भी साथ ले आईं. बच्चों के मंगल परिणय के बाद आशा तो यह थी की इस छोटे से सुखी परिवार की खुशियाँ अब और बढ़ जाएंगी लेकिन हुआ इसका उल्टा क्योंकि परिवार और उसकी प्रसन्नता के बीच में पैसा आ गया. छोटी बहु ने एक दिन अवसर देख कर कह ही दिया की मेरे पति की आय तुम्हारे पति से ज्यादा है बल्कि सारा परिवार ही मेरे पति की कमाई से चल रहा है. छोटी बहु के इस स्वार्थी व्यवहार ने पूरे परिवार को स्तब्ध कर दिया. ऐसे लगा दूध के विशाल पतीले में नीबू निचोड़ने के कारण सारा दूध ही फट गया हो, पैसे के प्रभाव ने परिवार के ताने-बाने को ही असत-व्यस्त करके रख दिया. माता-पिता भी अब भारी दृदय से यह स्वीकार करने लगे हैं की बेटों की बड़ी हुई कमाई से परिवार समृद्ध तो हुआ है लेकिन ये अहसास भी हमेशा बना रहता है कि घर में जब से पैसे की आमद बड़ी है तब से पैसा ही सबके सर पर चढ़कर बोलने लगा है और तब से परिवार का पहले वाला प्यार कोने में पड़े पुराने फर्नीचर की भाँती धूल खाने लगा है. भाइयों को भी अक्सर याद आता है की आभाव वाले वो दिन भी कितने खूबसूरत थे जिसमे खाने की थाली में पड़ी रोटी और थोड़ी सी दाल सब्जी का स्वाद कमाल का हुआ करता था और यह अहसास भी की आज के मंहगे होटलों में जाकर भी उस स्वाद का अहसास नहीं हो पाता.

 

पैसे के पीछे भागने की इंसानी आदत सदियों पुरानी है. अपने देश ग्रीस से चलकर सिकन्दर ने सारी दुनिया का पैसा अपनी जेब में डाल लेना चाहा लेकिन पैसे की बेवफाई तो देखीए की आज उसी ग्रीस का पैसे ने क्या हाल कर रखा है.

 

घर हो या मोहल्ला, गाँव हो या शहर, प्रान्त हो या देश हर जगह पैसे ने मानव की सहज उपलब्ध प्रसन्नता को पीछे धकेल दिया है. इंसान पैसे के पक्ष में नए-नए तर्क लाता है की पैसा नहीं होगा तो बीमारियों या अन्य परेशानियों की स्थिति में कोई भी साथ नहीं देगा. जबकि पैसे के पीछे भागते हुए लोगों ने पारिवारिक स्नेह को ध्वस्त करते हुए लोगों के जीवन से प्रसन्नता को ही छीन लिया है.

 

पैसे और प्रसन्नता में जब अंतिम चयन का अवसर आए तो प्रसन्नता को बचाने का प्रयास पहले करना चाहिए अर्थात पैसे की अपेक्षा प्रसन्नता ही महत्वपूर्ण है. नदियों पर बने विशालकाय बांधों से पैदा की गई बिजली को एक लाख दस हज़ार की वाट की ट्रांसमिशन लाईनों द्वारा उपयोग हेतु आगे ले जाया जाता है और गयारह हज़ार यूनिट की लाईनों से विशालकाय इलेक्ट्रिक ट्रेनों को चलाया जाता है. उसी बिजली को 440 वाट करके घरों के फ्रिज, टीवी कूलर आदि उपकरण चलाए जाते हैं. एक मर्यादा में हो तो बिजली लाभदायक है और मर्यादाएं टूटते ही वह विस्फोटक और प्राणघाती बन जाती है. पैसे और प्रसन्नता की भी यही स्थिति है. पैसे को प्यार करें लेकिन प्रसन्नता की कीमत पर कदापि नहीं.

 

 

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Source of story is internet, Courtesy to the writer for such a motivating note.