Uploaded on 21st November, 2011

मनमत नहीं गुरमत

हिन्दी आध्यात्मिक लेख

लेखक : राम कृष्ण 'मानव' (चित्रकूट, उत्तर प्रदेश)

दशहरा बहुत धूम धाम से मनाया गया. बुराई पर अच्छाई के प्रतीक इस उत्सव में बाल-वृद अमीर-गरीब सभी ख़ुशी-ख़ुशी शामिल हुए. रावण का पुतला जलाया गया सब खुश हुए चलो बुराई का अंत हुआ, पर अंत हुआ कहाँ, रावण पुतले से निकलकर लोगों के मनों में समां गया और फिर मन ही लंका बन गया I

रावण के पास बहुत कुछ था परन्तु एक चीज नहीं थी I संसार में कहा जाता है चलो सब कुछ है अगर एक चीज नहीं भी है तो कोई बात नहीं लेकिन रावण के पास जो एक चीज नहीं थी उसका न होना ही उसके विनाश का कारण बना, वह चीज थी 'गुरमत' I  गुरु की मत का आभाव उसे ले डूबा I  मनमत डुबो देती है पार गुरमत ही लगाती है I  रावण मनमत अर्थात मन के कहे अनुसार चलता रहा, कुल-परिवार, राज्य-प्रजा सब कुछ नष्ट होने के बाद संव्य भी समाप्त हो गया. I  रावण की कथा सुनने-सुनाने मात्र से कुछ बनने वाला नहीं है उसके जीवन से प्रेरणा लेनी होगी I

हमारे घर-आंगनों में गौरैया एक छोटा सा पक्षी होता है परिवार के सदस्य के सामान वह आँगन से कुछ अन्न कण चुग कर ख़ुशी-ख़ुशी जीवन जीता है I  यह नन्हा पक्षी अपना छोटा सा घोंसला बनाकर वहां मौजूद अण्डों की रक्षा करती है I  कौया उसके घोंसले पर बार-बार आकर उसके अण्डों को खाने का प्रयास करता है गौरैया कद-बल में बहुत छोटी होकर भी अण्डों की रक्षा के लिए कौए को दूर तक भगाकर आती है I  जान की बाजी लगाकर अण्डों को बचाती है I

पशु-पक्षी भी परिवार की रक्षा करना जानते हैं, लेकिन मनमत पर चलने वाले मनमुखों की हालत पशु-पक्षिओं से भी बदतर होती है I  एक प्रत्यक्षदर्शी सज्जन ने एक प्रसंग सुनाया I  एक बार वे कलकत्ता से दिल्ली आ रहे थे I  ट्रेन के सेकण्ड क्लास स्लीपर में यात्रा करते हुए उनके कोच में एक पति-पतनी और उनका बेटा सवार हुए I  उनके ट्रेन में बैठते ही धमाल शुरू हो गया I  वे आपस में छोटी-छोटी बातों पर उलझ कर झगड़ने लगते. ट्रेन में भी उनकी अलग ही दुनिया थी मानों घर के आँगन में विचर रहे हों.

मुगलसराय स्टेशन पर गाडी खड़ी होते ही कुछ नौजवान उस डिब्बे में आ गए. यद्यपि वह आरक्षित डिब्बा था और उन्हें वहां नहीं आना चाहिए था परन्तु आ गए. कुछ देर खड़े रहने के बाद उन्होंने कहा एक घंटे का सफ़र है हमें भी बैठने दीजिये. सब कहीं न कहीं एडजस्ट हो ही रहे थे की सामने विराजमान उस सज्जन ने उन नौजवानों के वहां बैठने का कड़ा विरोध किया I  'रिजर्व डिब्बा है आप यहाँ आये कैसे?' ऊंची आवाज में वे बोले I  प्राय बातें छोटे रूप में शुरू होकर आगे उग्र रूप धारण कर लेती हैं I  वाद-विवाद ज्यादा उग्र हो गया और बातों बातों में ही उस नौजवान ने उन्हें दो-तीन थप्पड़ रसीद कर दिए I

सभी अवाक रह गए यह क्या होने लगा ? वह सज्जन गुस्से में आकर बोले, ' तुम्हारी यह मजाल, तुमने मुझे थप्पड़  मारा I ' युवक ने कहा, 'हाँ मारा क्या कर लोगे बोलो?' वे बोले, 'तुम मुझे जानते नहीं हो I  मैं यह गुस्सा बर्दाश्त कर रहा हूँ लेकिन अगर तुमने मेरे बेटे की और आँख उठाकर भी देखा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा I ' युवक ने दो थप्पड़ उनके बेटे को मारकर कहा, 'लो अब जो करना हो करलो I ' वे बोले, तुमने मुझे मारा, मेरे बेटे को भी मारा I  तुम्हारे जैसा गन्दा आदमी मैंने आज तक नहीं देखा I  ऐसे असभ्य लोग भी ट्रेन में आ जाते हैं I ' उसे आवेश में बोलते हुए उन्होंने कहा यहाँ तो तो मैं बर्दाश्त कर गया लेकिन अगर तुमने मेरी पतनी पर हाथ उठाने की जुर्रत की तो समझ लेना की तुम्हारा क्या हाल हो सकता है?'

युवक ने उनकी पतनी को भी खींचकर दो थप्पड़ मारे I  कुछ देर सब कुछ शांत रहा I  सहयात्री भी आशंकित थे की आगे न जाने क्या होने वाला है I  तभी स्टेशन आ गया और वे सभी वहां उतर गए और आराम से चहल कर्मी करते हुए प्लेट फार्म से बाहर चले गए I

वे सज्जन जिन्होंने ये प्रसंग सुनाया उस व्यक्ति से कहने लगे, 'भाई साहब! आप परिवार के साथ सफ़र कर रहे हैं, आपको इन उद्धण्ड युवकों के साथ अनावश्यक विवाद में नहीं पड़ना चाहिए था I ' वे बोले, इन लड़कों को सबक तो सिखाना ही था साथ ही पतनी और बच्चे को भी वर्ना घर जाकर ये मेरी हंसी उड़ाते ही मैं पिटकर आया हूँ I  अब ये भी पिटे हैं इसलिए घर में ये मेरा मज़ाक नहीं उड़ायेंगे इसीलिए मैंने सोचा की मेरे पिटने के बाद इनका पिटना भी ज़रूरी हो गया है I

मनमुख, मनमत अपनाता है, मुंह की खाता है और खोखले तर्क देकर अपने बचाव करता है. रावण ने मनमत में आकर सुयोग्य पतनी मंदोदरी तथा भाई कुम्भकरण और विभीषण की बात नहीं मानी I  सर्वस्व नष्ट करके संव्य भी नष्ट हुआ I  इसलिए गुणी-जनों ने कहा- मनमत डुबा देती है, गुरमत पार ले जाती है. ए मेरे मन तू गुरु की मत पर ही चलना ताकि लोक सुखी व परलोक सुहेला हो सके I


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