Rev. Rajesh Kumar, Lucknow, UP

संतोष सदैव के लिए
लेखक : राजेश कुमार (लखनऊ, उत्तर प्रदेश)

संतोष का भाव व्यक्ति के खुश रहने से है. अगर संतोष नहीं है तो सब कुछ होने पर भी इन्सान सुख का अनुभव नहीं कर पाता. इसलिए संतोष कि आवश्यकता सबको है.

विश्व के महान क्रिकेट खिलाडी सचिन तेंदुलकर जब मुंबई में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तब वार्षिक परीक्षा में उन्हें बहुत ही कम अंकों से संतोष करना पढ़ा. इतने कम अंकों से कि वे फेल ही हो गए. सव्भाविक है कि इससे उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को गहरी निराशा हुई. ठोकर हमेशा उस इन्सान को लगती है जो चल रहा है जो बैठा हुआ है या जो सो रहा है उसे ठोकर लगने का सवाल ही नहीं पैदा होता. और ये ठोकरें छोटे-छोटे ककड़ों-पत्थरों से ही लगती हैं कभी ऐसा नहीं होता कि पहाड़ से ठोकर खाकर कोई व्यक्ति गिर पड़ा हो. सचिन ने भी जीवन कि उस घटना को गंभीरता से लिया. महान लोगों में अपने सब्र-संतोष और दृढ़ संकल्प के सहारे निराशा से बचने का माद्दा होता है. उन्होंने उस समय तो संतोष रखा लेकिन बाद में वे विश्व क्रिकेट मंच पर आये और रन बनाने के मामले में संतोषी नहीं महालोभी बन गए. जीतने कि भूख उनके अन्दर लगातार बढ़ती गयी. शतक लगाने में फिर कभी संतोषी साबित नहीं हुए. विजयी होने के लिए संतोष कि अपेक्षा साहस और तीव्र इच्छा शक्ति कि आवश्यकता होती है. इससे ऐसा आभास होता है कि संतोष व्यक्ति कि प्रगति को थाम देता है. उसे दिन-रात मेहनत करके सफलता पाने से हतोत्साहित करता है. लेकिन ऐसा है नहीं. कोई भी व्यक्ति हमेशा दौड़ता नहीं रह सकता, थकना, ठोकर खाकर गिरना, कुछ पल को विश्राम करना ये सब दोड़ने के दौरान ही होते रहते हैं. ये गति का ही अंग है.

संतोष गति को उर्जा देता है. संतोष रुपी दृढ़ चट्टान पर खड़ा व्यक्ति जीवन में सफलता के मनोरथ को पूरा करके ही रहता है क्योंकि वह लालसाओं, कामनाओ, कल्पनाओं के फिसलन भरे स्थान पर खड़ा नहीं होता. कभी 10वीं कक्षा में असफल हुए सचिन कि जीवनी आज उसी दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में बच्चों को पढ़ाई जाती है ताकि वे भी सफलता का सूत्र समझ सकें. संतोष सफलता में तो सहायक है ही यह व्यक्ति को ठहराव भी देता है. और उसे विनाश से बचा भी लेता है.

धर्मराज युधिष्टर सत्य और संतोष वाले थे. योगेश्वर श्री कृष्णा ने उन्हें जो कुछ कहा उसे उन्होंने कल्याणकरी मानकर सवीकार किया. पांडवों को पाँच गाँव देने का आग्रह  दुर्योधन से करते हुए सदगुरु श्री कृषण ने महाभारत का युद्ध रोकना चाहा परन्तु वह सुई कि नोक के बराबर जमीन देने को भी राजी न हुआ. परिणाम हुआ महाभारत का युद्ध और महाविनाश. लेकिन वह महाविनाश होकर ही रहा क्योंकि अहंकारी का जीवन उस रेगिस्तान कि तरह होता है जिसमे सब्र-संतोष का कोई नखलिस्तान (सरोवर) होता ही नहीं.

काश उस समय संतोष अपनाया जाता तो इतनी जन-धन हानि न होती. उस समय तो यह स्थिति थी ही, आज के समय में भी संतोष लोगों के मनों में कहाँ है? आज एक भाई दूसरे भाई का हक़ डकार कर आँखें भी दिखाता है. अपनी अनीति के समर्थन में तर्क और अनितिवान गवाह पेश कर देता है. सब कुछ हड़प कर कोर्ट-कचहरिओं में अपने पक्ष में फैसले करवा लेता है. संतोष के आभाव से मन में उत्पन्न हुए महाशून्य में फिर लोभ-लालसाओं का भीषण चक्रवात ही आएगा, मधुमास कि मधुर मंद समीर वहां कहाँ बहेगी?

लोभ आग के सामान है और संतोष शीतल जल फुहार कि तरह. लोभ समस्त व्याधियों आपदाओं कि जननी है. संतोष ही लोभ पर नियंत्रण करता है. जहाँ संस्कार नहीं, संतोष नहीं वहां हाहाकार होता है. आज कल यह भी खबरे आती हैं कि बेटे ने धन के लोभ में पिता को मार डाला. वह धन जो उसको मिलना ही था लेकिन सब्र-संतोष न होने के कारण ऐसे वीभत्स काण्ड होते रहते हैं. इसलिए महापुरषों ने तो यही कहा कि संतोषी सदा सुखी. संतोषी कुछ पल-क्षण, दिन मात्र नहीं हमेशा सुखी रहता है. गहरी आसक्ति और लालसाओं कि चिलचिलाती धूप में संतोष कि शीतल छाया कुछ समय के लिए नहीं सदैव के लिए चाहिए.

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