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uploaded on 10th August, 2012



सम्पूर्ण धरा हो आनंदमय

(हिन्दी आध्यात्मिक कविता)

कवि : श्री राजेश कुमार जी (लखनऊ)

हे प्रभु!
हे परमपुरुष!!

हैं सूरज चाँद तुम्हारी आँखें,
व्योम उदर, धरती है गोद.
जिसमें बैठे हैं, तुम्हारे कोटि-कोटि बच्चे,
लेकर कई नज़ारे.
और अपनी नन्ही हथेलियाँ तुम्हारे आगे पसारे.
इन हथेलियों पर रख दो - उदारता पूर्वक,
अन्न कण, धन, जल.
हर किसी के श्रम का न्यायोचित फल.
सभी धरतीवासी तृप्त हों.!
हों, सुखी व खुशहाल. विचरण करें-
तुमारी गोद में लेकर अपने दिल विशाल.
रूदन, रुस्वाइयां, मायूसियाँ -
कहीं भी न हों धरा पर
ऐसी मेहर कर!
यहाँ सर्वत्र दूध-जल-अन्न की बहारें हों.
करुणा, दया प्रेम की फुहारें हो.
प्रेम अपनत्व से भर उठे, धरा सारी,
महके चहुँ और इंसानों की फुलवारी,
न हो कहीं भी घृणा-हिंसा के बादल,
संघर्ष की विभीषिका,
अत्याचार के तांडव,
खिल उठें चेहरे सभी के, सम्पूर्ण धरा हो आनंदमय.


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