सत्य मानव जीवन की सफलता की  कुंजी 
पवन कुमार कोहली, दिल्ली
           'सत्यम शिवम सुन्दरम' यानी सत्य ही शिव या ईश्वर है ओर सच बोला अति सुन्दर है .,  सत्य शब्द से ही मानव जीवन में एक श्रद्धा की महक आती है, सत्य शब्द कहना ओर सुनना जितना आसन है , उतना ही इसको अपने जीवन में उतारना बहुत  मुश्किल है , मगर जब यह सत्य शब्द इस मानव जीवन में उतर  जाता है  तब यह जीवन आनंदमय हो जाता है और खुशिया अपने आप ही इंसान को घेर लेती है . बचपन में हमेशा बच्चे को सच बोलने का पाठ पढ़ाया जाता है ओर कहा जाता है सच बोलना सही है ओर झूठ बोलना पाप है .मगर इसके लिए सबसे पहले इस निरंकार के ब्रहम-ज्ञान का  बोध होना आवश्यक है इस ब्रहम-ज्ञानं को अपने जीवन में ढाल कर  ओर संतो महापुरुष  के संग में  रहकर  सत्य को अपने जीवन में कबूल किया जाता है , क्योंकि सत्य ही  इस निरंकार को प्राप्त करने की सीढ़ी है , जब तक इंसान में सत्य की भावना का विकास नही होता है , तब तक इंसान  नफरत, वेर , अहंकार , निंदा , काम, झूठ , दूसरो को नीचा दिखाना , लालसा , मोह आदि जैसे  दानवो से घिरा रहता है , ओर इस निरंकार -परमात्मा की लीला को भी अपने जीवन में कबूल नही करता है 
           " एक ही निरंकार प्रभु है , सच्चा केवल जिसका नाम 
              कर्ता-धर्ता हर वस्तु का, रचा है जिसने जगत तमाम " 
 सत्य है क्या , यह निरंकार ही सत्य है , बाकी सब झूठ है , यदि इंसान इसको  जान लेता है तो वह भी परमानंद को अपने जीवन में महसूस करता है , क्योंकि इस संसार में सब चीज़े मायावी है , जिनका अंत किसी ना किसी समय होना जरूरी है , मगर यह निरंकार प्रभु का कोई भी अंत नही है ,परम सता जिसको निराकार , अकालपुरख कहा जाता है यह ही सत्य है, इस सत्य का बोध हासिल करना महापुरुषों ने लाजिम बताया है  " आदि सचु , जुगादि सचु , है भि सचु, नानक होसी भि सचु.
येही सत्य है जो कल भी था , आज भी है , ओर आगे भी कायम रहना वाला है  इसमें कोई भी  बदलाव होने वाला नही  , यह सर्वत्र परम सता है  यह तो सर्वव्यापी है , जो  हर जगह मोजूद  है , कण-कण में इसका वास है , जरे-जरे में यह निरंकार है , जब इंसान इस बात  को सत्य मान  लेता है , तब इस मानव जीवन में एक  क्रांति आती है , जो उसको इस परमात्मा के बिलकुल करीब कर देती जब वह इस निरंकार प्रभु को अपने संग समझता है , ओर हर पल इस निरंकार का ओर उसकी लीला के लिए शुकराना करता है ,एक प्रभु, परमात्मा , ईश्वर, वाहे-गुरु को ही अनेको नामो से पुकारते है , इसको को ही सत्य माना गया है  जो हमेशा हमारे पास है . इसके विपरीत जो कुछ भी यह आँखे देख रही है , वह असत्य है  " जगत की शोभा वे बनते है , जो सच को मानकर गुरु के वचनों को अपने जीवन में अपनाते है " लहरों का उचा -नीचा उठना तो हम देखते है , लेकिन समुन्दर का अपने आप में जो वजूद है, वो उसी प्रकार बना हुआ है , यदि लहरें है तब भी समुन्दर है , यदि लहरें नही है तब भी समुन्दर अपना जगह पर है . ये ही सत्य है ओर कोई पहलु सत्य नही हो सकता है . जब संत लोग इस सत्य को जानकर इस निरंकार को हासिल कर लेते ओर उसके भाणे में अपने जीवन का सफ़र पूरा करते हैं तब भवसागर को बिना मुसीबत से पार  करते है .
ज़िन्दगी का एक अटल सत्य यह भी है कि जो इस संसार में आया है वह जाएगा भी, जिस  काम के लिए हमें इस निरंकार ने भेजा है उस काम को पूर्ण होते ही हमें इस निरंकार के दरबार में जाना पड़ता है , ओर जो यह शरीर पाच तत्वों से बना है इसमें  ही  लीन हो जाता है   एक बात यह भी सत्य है कि जो निरंकार के प्यारे होते है , उनको खुद यह निरंकार -प्रभु  अपने आप लेने आता है   चाहे हमें अच्छा लगे या ना लगे पर एक दिन इस जीवन का अंत होगा ही , कबीर जी ने कहा है 
कि :-
                 " आया है जो जायेंगा , राजा रंक फकीर 
                   एक सिंहासन चढ़ी चले, दूजे बंधे जंजीर" 
              सत्य बोलने से जीवन में नम्रता का भाव, विश्वास , वाणी में मिठास आती है सत्संग वह तरीका है जिससे सेवा ओर सिमरन के वरदान से सत्य बोलने की सहज प्रकिया प्रबल होती रहती है
साध-संगत में जब सतगुरु के ओर संतो के वचन या आशीर्वाद आते है, वह अटल सत्य होते है, यदि उनके वचनों को हम अपने जीवन में ढाले तो वह  ऐसा कोई अवसर नही जब हमारे जीवन में खुशिये के खेड़े ना हो. ओर हमारा जीवन आनंदमय ना हो . इसलिए हमेशा संत सत्य का  मार्ग दिखाते है , जिस मार्ग पर चलकर हम अपने इस जीवन के लक्ष्य  को प्राप्त कर सकते है संतो ने हमें सेवा, सिमरन ओर संगत वाला सत्य मार्ग दिखाया है, इस पर  चलकर हम इस निरंकार को इस जीवन  में ही हासिल कर सकते है ओर मोक्ष को प्राप्त कर सकते है इसी जीवन में , मगर इसके लिए सतगुरु का होना हमरे जीवन में अति-आवशक है , क्योंकि उनके आशीर्वादो के बिना यह हर कार्य असंभव  है , केवल ये ही जीवन का मार्गदर्शन है , जिससे हमारा मन  सत्य की ओर अग्रसर होता रहता है सत्य का आधार केवल संतो का संग होता है ,जो अपना मन सत्य रूप में सतगुरु के चरणों में  बेचता है , उसके  सारे काम यह सतगुरु  खुद करता  है ,
   कहा भी गया है : मन बेचै सतगुरु के पास, तिस सेवक के कारज रास
इसलिए इंसान को हमेशा याद कराया जा रहा की सतगुरु की शरण में आकर इस  निरंकार को (सत्य को) इस जीवन में प्राप्त कर लो जिस कार्य के लिए हमको इस परमपिता-ईश्वर ने  इस सत्य को जानने के लिए भेजा है येही संतो की वाणी है फिर जब समय इस सत्य को छोड़कर निकल जाएगा तब पछताने से कुछ नही होना है  :-  " राम नाम की लूट है , लूट सके तो लूट , अन्तकाल पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट"

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