"संतोष"  संतो- महापुरुषो  की पूंजी 
लेखक : श्री पवन कुमार कोहली, दिल्ली

" संतोष"  शब्द का सरल शब्दों में अर्थ है , धीरज ,सबर करना , धैर्य रखना या तसल्ली करना होता है    यह शब्द मन के हर भावो पर अपना पूरा-पूरा असर करता  है , यानि मन के भावो पर नियत्रण रखना ही "संतोष" :कहलाता है.  "संतोष"  सिर्फ महापुरुषो , संतो तथा अन्य सज्जन पुरुषो की पूंजी होती है ,  जो कि अपने मन के भावो पर काबू करके इस निरंकार-प्रभु के भाणे में अपना जीवन के सफ़र को पूरा करते हैं, ओर दूसरों को भी  ऐसा ही जीवन जीने की प्रेरणा देते है  यह संतोष शब्द  वाली पूंजी संतो ने बड़ी तप से तथा सतगुरु की कृपा से कमाई होती है. जो इंसान सतगुरु के विचारो को मानकर उनको अपने जीवन के व्यवहार में अपना लेता है , उसके मन के अन्दर नम्रता, सहनशीलता , विश्वास , सदभावना, विशालता , दया , करुणा  व  मिलवर्तन वाले दिव्य -गुण आ जाते है मगर इसके लिए मन में संतोष का होना आवश्यक है , क्योंकि इसके बिना कोई भी गुण को अपने जीवन में ढाला नही जा सकता है ओर इसके लिए सतगुरु की  कृपा का होना बहुत ही जरूरी है .
   
               जब इंसान अपने मन के भावो पर नियत्रण कर लेता है अर्थात मन में संतोष होता है  तो हर कार्य इस जीवन में संभव है . मगर जरुरत है तो सिर्फ संतो ओर महापुरुषो के वचनों को मानकर उन पर चलने की,  तब यह  निरंकार परमात्मा भी हमारे सारे कार्यो को सुचारू रूप से  करता है . मानव जीवन को शोभा देने वाले गुंणों में एक विशेष गुण मन पर नियंत्रण यानी संतोष के भाव का होना है  इसको अपनाने से जीवन में  धैर्य और शांति की प्रप्ति होती है  कहते है क़ि "सबर का फल हमेशा मीठा होता है "  और यह दिव्य गुण इंसान को  कामयाबी की तरफ अग्रसर करता है 
संत- कबीरदास ने भी कहा है की :-
:                           "धीरे -धीरे रे मना धीरे धीरे सब कुछ होए ,
                              माली सींचे सौ घड़ा ऋतू आये फल होए" 
संतोष  से मन भी निर्मल हो जाता है , मन निर्मल होने से जीवन का हर पल निर्मल हो जाता है , मन निर्मल होने पर मन की सारी क्रियाए अपने आप यह निरंकार-प्रभु  खुद  चलाने लगता है.
एक मजदूर इंसान दिन-भर मेहनत करके रात को खाना खाकर चाहे वह एक प्याज या गुड से खाया हो , इस निरंकार के प्रति संतुष्टि वाले भाव रखकर इस प्रभु का शुक्रिया करते हुए पूरी रात  आनंद वाली निद्रा लेता है . क्योंकि वह इस निरंकार की रज़ा को इसके भाणे को स्वीकार करता है ओर वह जानता  है क़ि यह परमात्मा जो भी करेगा उसके लिए वह ठीक करेगा ,  ओर दूसरी तरफ एक अमीर इंसान जिसके पास सिर्फ धन ही धन है, वह इस धन को ही अपना प्रभु मानता है ना ही इस निरंकार के लिए अपने मन में शुकराने वाले भाव रखता है , बेचैनी से सारी रात, आरामदार बिस्तरा व वातानुकूलित ( A.C.) हवा  होते हुए भी  निद्रा  से दूर रहता है , क्योंकि उसके मन के अन्दर संतोष नही है , उसकी अभिलाषाओं  का कोई अंत नही है . इस लिए उस  इंसान का मन हमेशा धन की तरफ लगता है . वह धनी व्यक्ति धन होने के होते हुए भी  गरीब है क्योंकि उसके पास संतोष धन नहीं है.
                             " जिस दे दिल निरंकार दा वासा , हुन्दा नहीं ओह बेसबर 
                                कहे अवतार हर हाल दे  अन्दर करदा रब्ब दा शुकर-शुकर "
                                                                           -  ( सम्पूर्ण अवतार वाणी) 
गुरु - अमरदास जी के दो लड़के थे ओर एक दामाद था. गुरु साहेब ने इम्तहान की कसोटी रख दी , गुरु-साहिब  जी का हुकम आया जी , अमुक मैदान में अपनी-अपनी मिटटी के  चबूतरे बनाओ , सब ने चबूतरे बनाये.  गुरु-साहिब  जी ने कहा की यह ठीक नही है फिर से बनाओ, सब ने फिर से बनाये. फिर से गुरु-साहिब  जी ने कहा की यह भी ठीक नही है सब ने फिर से बनाये . गुरु-साहिब जी ने कहा की यह ठीक नही है ओर यह जगह भी ठीक नही है , अपनी-अपनी मिटटी उस मैदान में ले जाओ ओर फिर बनाओ  सब ने फिर से बनाये   लेकिन गुरु-साहिब जी ने उनको भी  पसंद नही किया .  जब चार-पांच बार इस तरह हुआ , तब लोगो ने सोचा कि  गुरु-साहिब की अक्ल काम नहीं कर रही है  यह सोच कर काफी लोग हट गए, जो लगे रहे उनसे गुरु-साहिब चबूतरे बनवाते रहे  ओर गिरवाते रहे., एक-एक करके सभी छोड़ गए , एक गुरसिख  रामदास जी रह गए, जो अपने मन के अन्दर संतोष ओर सहनशीलता का उदारण देते हुए  गुरु-साहिब जी के हर हुकम को मानते रहे ,  लोगो ने रामदास जी को कहा की तुम भी छोड़ दो,लेकिन रामदास जी ने नही छोड़ा , आखिर वे लोग कहने लगे कि गुरु-साहिब  भी पागल है ओर तू भी पागल है , रामदास जी रो पड़े ओर कहा की अगर गुरु-साहिब जी  की अक्ल कायम नही तो किसी की भी अक्ल कायम नही है , अगर गुरु-साहेब जी सारी उमर इसी तरह मुझे हुकम  देते रहेगे , तब भी राम दास सारी उमर चबूतरे बनाता रहेगा. ग्रन्थकार लिखते है कि सतर बार चबूतरे बनाये गए ओर सतर बार गिराए गए. 
भाव ये ही है कि  गुरु-साहिब जी यह चबूतरे क्यों बनवाते ओर गिरवाते थे, केवल इसलिए कि जिस इंसान को गुरु-साहिब जी की गद्दी पर बैठना है, उसके अन्दर सतगुरु के प्रति पूर्ण विशवास हो, वह बिना अपनी अक्ल का इस्तेमाल किये गुरु-साहिब के हुक्म को मानने वाला हो. गुरु राम दास जी का संतोष, विश्वास, नम्रता , दया , सहनशीलता , विशालता, करुणा, गुरु-भक्ति ओर अनेको दिव्य - गुंणों को  देखकर आखिर गुरु-अमरदास महाराज  जी ने उनको अपने  छाती से लगा लिया ओर उनको हर तरह से भरपूर कर दिया. 
यदि इंसान को अपने मन के अन्दर संतोष की  भावना को जगा कर रखना है तो सतगुरु से इसके लिए विनती करे, संतजनों ओर महापुरुषो  के  विचारो पर ओर उनके दिखाए हुए मार्ग पर  चले. सेवा , सिमरन ओर सत्संग वाला अमृत हर रोज़ , हर पल पीने से हमारे  मनो के अन्दर संतोष की  भावना जगी रहेगी ओर अपना जीवन जो  इस निरंकार- प्रभु  ने बक्शा है इसको आनंद से , प्यार से ,  सुचारू रूप से ओर संतो- महापुरुषो के  दिखाये  हुए मार्ग पर चल कर तय करेंगे.
www.gurdeepsingh.jimdo.com - A Spiritual Website

Share Your Views

God Bless All is loading comments...