उस समय समझ लेना चाहिए की वह निरंकार-दातार से जुड़ा हुआ नहीं

ब्रह्मज्ञानी तो निरंकार-दातार के साथ जुड़ा होता है, उसने अपना सर्वस्व निरंकार को अर्पण कर रखा होता है, इसलिए वह जो भी कर्म करता है, ईश्वरीय इच्छा में ही करता है. ईश्वरीय इच्छा कल्याण करने वाली है, सबका भला करने वाली है, इसलिए ब्रह्मज्ञानी के कर्म भी सबका भला करने वाले ही होते हैं, कल्याणकारी ही होते हैं. जब तक वह दातार से जुड़ा है, उससे बुरा कर्म हो ही नहीं सकता, और जब उससे कोई बुरा कर्म होता है, उस समय समझ लेना चाहिए की वह निरंकार-दातार से जुड़ा हुआ नहीं. यह कर्म उसे अपने अहम् की करनी है. उसका फल ज्ञानी को भी अवश्य भोगना पड़ता है.

 

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज, बुक : गुरुदेव हरदेव, भाग-1 , पेज 58

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  • #1

    nirmala (Thursday, 19 May 2016 01:17)

    True