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तीन काल है सत्य तू - निरंकारी बाबा जी 

 

 इसी परमात्मा की महिमा गाते हुए संत कहते हैं की हे प्रभु! तू बेअंत है, तू बेमिसाल है| तेरी कृपा से ही हम सजे हुए हैं| तेरी कृपा से ही हमें सब कुछ प्राप्त हो रहा है| सृष्टि की सारी कायनात की तू ही रचना करने वाला है, तू ही पालना करने वाला है| इसका अंत भी तेरे ही हाथ में है|  जैसे आप जानते हैं की ब्रह्मा, विष्णु, महेश - यह तीनों ही रूप परमात्मा (GOD) के हैं| GOD में अगर हम 'G' को जेनरेटर (Generator) कह दें तो भाव है की जो पैदा करने वाला है| अगर हम 'O' को आपरेटर (Operator) कह दें तो भाव है की जो संचालन करता है, तो आपरेट करता है, जो चलता है| 'D' को अगर हम डिस्ट्रॉयर (Destroyer) कह दें, तो प्रलय करता है| कहने का भाव की यह प्रभु के गुण हैं, लेकिन आज इंसान केवल नामों तक ही सीमित रह गया है| जिसके सब नाम है, उस परमात्मा को जानना ही वास्तविक ज्ञान है|

 

यह निराकार परमात्मा घट-घट में समाया हुआ है| इसका कोई आदि अंत नहीं पाया जा सकता| यह कल भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा| आज इंसान इतिहास से यह जो जान पाता है की पहले इंसान की शक्ल-सूरत कैसी थी, लेकिन इस परमात्मा की होंद (अस्तित्व) के बारे में इंसान कुछ नहीं जान पाता, क्योंकि इसका कोई आदि-अंत नहीं पाया जा सकता| यह ऐसी शक्ति है, जो वास्तव में सारे संसार का संचालन कर रही है| यही शक्ति सदैव सत्य रहने वाली है| सत्य हम उसी को कहते हैं जो तीनों कालों में एकरस रहता है जो अभी कुछ हो, चाँद घंटों में कुछ और हो जाए, चाँद वर्षों में कुछ और हो जाये, उसे हम सत्य नहीं कह सकते| वह मिथ्या माया है|

 

इस निराकार परमात्मा के बारे में लिखा है की - 'आदि सचु जुगादि सचु| है भि सचु, नानक होसी भी सचु|'  भाव, तीन काल सत्य रहने वाली सत्ता 'एक अकाल पुरुख ही है| इसके बारे में लिखा है -

 

बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना|

कर बिनु करम करइ विधि नाना|

आनन रहित सकल रस भोगी|

बिनु बानी वकता बड भोगी|

 

 

इस एकरस रहने वाले परमात्मा को आग जला नहीं सकती, शस्त्र काट नहीं सकते, वायु उड़ा नहीं सकती| इसका आदि-अन्त नहीं पाया जा सकता| जो ऐसे गुणों वाले दातार का आसरा ले लेता है, आधार मानता और जानता है, वह फिर किसी के समाप्त करने से समाप्त कैसे हो सकता है? यह दातार अमर है| जो भी आत्मा इसके साथ जुड़ जाती है, वह भी अमर हो जाती है| संत कबीर कहते हैं -

 

मैं न मरउ मरिबो संसारा|

अब मोहि मिलिओ है जिआवनहारा ||

 

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 26-27