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सिमिर सिमिर सिमिर सुख पाइआ

संत महापुरुष अपने काम करते हुए भी परमात्मा का सिमरन करते रहते हैं| गुरु नानक देव तुलाई करते समय तराजू के पलड़े गिन रहे थे, एका, दोवां आदि कर रहे थे जब 12 के बाद 13 पर पहुंचे तो 'तेरा ही तेरा' कहना शुरू कर दिया| इस दातार के साथ ही ध्यान जुड़ गया, इस दातार में ही खो गए| इसी तरह से 'तू ही तू' का सिमरन दिया गया है| 'मैं' सिमरन कहीं नहीं दिया गया है| ज्ञान देने के बाद हमें इस 'तू ही निरंकार' का सिमरन दिया गया है, लेकिन तू को अगर दूर करके हम बीच में मैं को ले आते हैं, अपने आप को अहमियत देना शुरू कर देते हैं, तो वह घड़ी बेचैनी की घड़ी बन जाया करती है| अगर इस तू ही का ध्यान किया, अगर इस तू ही को ही समर्पित हुए, इसको ही समर्पण कर दिया तो जीवन का हर पल सुख में और आनन्द में व्यतीत हुआ करता है| तभी तो कहा है -

 

सिमिर सिमिर सिमिर सुख पाइआ|

 

इस दातार इस निराकार का सुमिरन करते हुए जो वास्तव में अपने मन को लगा देता है, उसका मन हमेशा आनंद में रहता है, हमेशा उसकी सहज अवस्था रहती है| वे कभी किसी की बातों को ग्रहण नहीं करते|

 

साधसंगत! इस निरंकार प्रभु-परमात्मा को जिस जिसने भी अपना लिया है, उसके मन की जोत जग उठी है| जब ज्योति जग उठती है और दायें, बाएं या किसी तरफ से भी हवा चलती है तो उस लौ को चारों तरफ हाथों से ढांक लेते हैं, दोनों हथेलियों से, इस तरह से चारों तरफ उस लौ को एक चादर सी ओढा लेते हैं, जिसके कारण हवा दीपक की उस लौ पर असर नहीं करती और वह बुझ नहीं सकती है| इस तरह से ज्ञान की लौ, ज्ञान की ज्योति को, जो गुरु की कृपा से जगाई जाती है इसकी भी देखभाल की जाती है, इसको बुझने नहीं दिया जाता|" किसके द्वारा? साधसंगत के द्वारा सेवा के द्वारा, सिमरन के द्वारा| यह एक ऐसी ढाल है, जो इस ज्ञान की ज्योति को बुझने नहीं देती|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 57-58