सेवादार भाई कन्हैया की  दृष्टि (Drishti) से सब की सेवा करता है 

 

भक्त निष्काम भाव से भक्ति करते हैं| अगर साध संगत में आते हैं, सेवा करते हैं, तो इस भावना से नहीं की पदार्थ के रूप में या किसी और रूप में हमें कोई प्राप्ति होती है| ये भक्ति निरोल एक प्रेम भाव से करते हैं| जिस तरह से एक माँ का प्यार अपने बच्चे के साथ होता है, एक निरोल वात्सल्य भावना उसके साथ जुड़ी रहती है, इस तरह से भक्त हमेशा इस निराकार दातार की भक्ति करता है, एक फ़र्ज़ मानकर एक कर्म मानकर ही करता है| कभी कामना नहीं रखता, लालसा नहीं रखता| संसार में हम देखते हैं की भक्ति भी शर्तों के साथ की जाती है| इसलिए सहज अवस्था नहीं प्राप्त होती है| जब कुछ प्राप्त हो जाता है, तो आकाश को छूने लगते हैं और कहीं पर कोई देरी हो जाती है या नहीं प्राप्ति होती तो उसी वक़्त गिले-शिकवे, इस दातार की तरफ, शुरू हो जाते हैं| लेकिन भक्त की बहुत ऊंची अवस्था है| कि -

 

जो नरु दुःख मैं दुखु नहीं मानै,

सुख सनेहु अरु भै नहीं जाकी कंचन माटी मानै||

 

एकरस सहज अवस्था इसकी होती है| और संसार में -

 

फल कारण सेवा करे, ताजे न मन से काम,

कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना दाम||

 

साथ संगत, जितने भी भक्त महापुरुष इस संसार में हुए हैं, जिनका हम आज नाम लेते हैं, उनके भक्ति भाव को हम जानते हैं की अपनी मत को त्याग कर अपनी लालसाओं को त्याग कर ही उन्होंने भक्ति की| पूर्ण तौर पर हुक्म को मानकर हुक्म में रहकर ही उन्होंने भक्ति की|

 

अगर बहुत सरदारियाँ भी बख्शी गईं, तब भी ऐसी ही भावना प्रकट करते रहे हैं की दातार चाहे कितना भी संसार में यश करा दें, लेकिन यह जो तबेले में (अस्तबल में) सेवा मिली है, यह हमेशा प्राप्त होती रहे|

 

सेवा या भक्ति की इतनी बारीक डगर है| जिस तरह से अवतार बाणी में कहा है कि--

खंनिअहु तिखी वालहु निकी|

 

 

(बाल से बारीक, तलवार से तेज)| कोई किसी चौड़ी दीवार के ऊपर चल रहा हो तो हमें थोड़ा आश्चर्य होता है और अगर जगह कम हो, एक ईंट की दीवार के ऊपर चल रहा हो तो हमें आश्चर्य और ज्यादा होता है| फिर एक पतली तार के ऊपर चलना शुरू हो जाता है, तो देखते हैं की कितनी कठिनाई से वह चलता है| जब वह उस तार के ऊपर सहज भाव से चलता जाता है, तभी वास्तव में उसकी ज्यादा जय जयकार होती है| इसी तरह से इस मार्ग (सेवा) के ऊपर भी जो चल पड़ता है, उसको भी संसार में यश प्राप्त होता है| भक्ति का ऐसा ही जीवन होता है| वह आठों पहर प्रभु की कृपा मानता है और कभी अपने आप को करता नहीं मानता | कभी अपने आप को दाता भी नहीं मानता| यही जानता है की दाता एक है, एक ही देने वाला है| यह पालन-पोषण  करने वाला है| हमेशा आठों पहर इसका ही शुकराना करता है| जब वह ठन्डे में गर्म में, उतार में --चढ़ाव में, एक प्रभु को ही करता मानकर चलता जाता है, तो इसका जीवन सरल बन जाता है, वर्ना कदम-कदम पर ये डोल सकता है| बहुत यश मिल जाये, तब भी डोल जाता है और यदि हाथ से कोई सांसारिक वस्तु चली जाए, तब भी ये डुलायमान हो सकता है| तब भी इसकी मायूसी वाली अवस्था  हो सकती है| एकरस जो चलता है, वह वास्तव में भक्त होता है और एकरस तभी हो सकता है, जब अपना पूर्ण विश्वास दातार के ऊपर रखता है| अपना अकीदा इस दातार पर रखता है|

 

सेवादार भाई कन्हैया की दृष्टि से सब की सेवा करता है | वह अच्छे बुरे या अपने बेगानों का फर्क, सेवा में नहीं करता|

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 64-65-66