सेवा, सुमिरन, सत्संग आदि की ज़रुरत क्या है?

महात्मा जे.आर.डी. 'सत्यार्थी' जी का सवाल : शहनशाह जी, जब आपका निश्चित मत है की ब्रह्मज्ञान मुक्ति का दाता है और यह भी सत्य है की सद्गुरु की कृपा से हमें ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है तो सपष्ट है की हम मुक्त हैं, फिर सेवा, सुमिरन, सत्संग अदि की ज़रुरत क्या है?

 

शहनशाह जी ने कुछ क्षण मौन रहकर फरमाना आरम्भ किया - "शास्त्री साहब, ब्रह्मज्ञान का फल मुक्ति है, इसमें दो राय नहीं, परन्तु ज्ञान टिका रहे अंतिम स्वांस तक, तब| ये सेवा, सुमिरन, सत्संग ब्रह्मज्ञान को कायम रखने के लिए किए जाते हैं| आप तो जानते हो की ये संसार है| संसार की माया बड़ी प्रबल है| माया किसी वक़्त भी मन को भरमा सकती है, अपने फंदे में फंसा सकती है| इस माया से हम बचे रहें, हमारा मुख सद्गुरु के साथ जुड़ा रहे और ये ज्ञान सद्गुरु की कृपा से जो हमें प्राप्त हुआ है, सदा कायम-दायम रहे, ये सारे यत्न इसलिए किए जा रहे हैं| मुक्ति के लिए किसी कर्म या कर्मकांड की ज़रुरत नहीं, मुक्ति तो सिर्फ ब्रह्मज्ञान से ही संभव है|" कहते कहते शहंशाह जी फिर खामोश हो गये| दास को लगा की शायद शहनशाह जी उठकर अपने कमरे में जाना चाहते हैं| परन्तु उसी समय शहनशाह जी ने मौन भंग करते हुए फरमाना शुरू किया - "शास्त्री साहब, ब्रह्म का ज्ञान बड़ा ही सूक्ष्म है, यह किसी समय भी लोप हो जाता है| इसको अंत समय तक संभाले रखने के लिए सद्गुरु की कृपा दृष्टि, साथ संगत का संग और महात्माओं की सेवा करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते रहना ज़रूरी है| ज्ञान टिका रहा तो मुक्ति निश्चित है|

 

---सतगुरु शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज

साभार : बुक शहनशाह, पेज 16-17