संत  समागम  हरि  कथा, तुलसी दुर्लभ  दोय 

 

 महापुरुष तो सबको दिल से प्यार करते हैं| उनका प्रेम शरीर की भावना से  नहीं, निरंकार (आत्मतत्व) की भावना से होता है| ऐसी ही भक्ति हमेशा से महापुरषों भक्तों ने की है| उन्होंने इस प्रभु-परमात्मा के साथ ह्रदय से प्रेम किया, लोगों को दिखाने के  लिए नहीं किया और न ही सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इस प्रभु की प्राप्ति की है, क्योंकि वे जानते हैं की भक्ति के द्वारा ही सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति नहीं होती| ये तो उनको भी प्राप्त हो जाती हैं जो डाके डालते हैं, चोरियाँ करते हैं, बुरे काम करते हैं| उनके पास शायद दौलत ज्यादा हो, धन-सम्पति ज्यादा हो -

 

सुत दारा और लक्ष्मी, पापी के भी होए|

सन्त समागम हरि कथा, तुलसी दुर्लभ दोय||

 

जो पापी हैं, बुरे काम करने वाले हैं, उनको भी ये वस्तुएँ प्राप्त हो जाती है, लेकिन दुर्लभ वस्तु सन्त समागम है| महापुरषों की संगति ही दुर्लभ है|

 

महात्मा कभी भी भौतिक पदार्थों का सहारा नहीं लेते| इनका यथोचित उपयोग करते हुए भी वे प्यार परमात्मा से ही करते हैं| महापुरुषों-सन्तों का एक यही निराकार परमात्मा ही आसरा हुआ करता है| यह एक ऐसा नाम का दारु (दवा) है जो हम सब के रोगों को दूर कर देता है, इन रोगों से मुक्त कर देता है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 83