संत  न होते  जगत  में तो जल मरता संसार 

 

दास आकार मिसाल देता है की एक पेड़ होता है, उस पर फल लगा होता है| कोई अगर उसे पत्थर भी मारता है तो भी वह पेड़ उसे फल ही देता है| इसी प्रकार संतों-भक्तों ने भी सब कुछ सहन करके संसार को हरि नाम ही दान दिया, अमर पद ही प्रदान किया| जैसे पेड़ पूरा दिन संव्य धूप में खड़ा रहता है लेकिन अपने करीब आने वालों को छाया ही प्रदान करता है| इसी प्रकार भक्त भी संसार को छाया देते आये हैं| इन संतों-भक्तों की बदौलत ही, उनके परोपकारों की बदौलत ही, इस सत्य के सन्देश के कारण ही धरती का निखरा हुआ रूप सामने आता है| जहाँ भी इस रौशनी की कद्र नहीं की, जहाँ-जहाँ भी महापुरषों को शक की निगाह से देखा गया, उनके प्रति घृणा और वैर रखा गया, वहाँ अन्धकार ही बना रहा और उसमें निवास करने वाले पतन की ओर गये, उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ| इसके विपरीत जहाँ उजाला स्थापित हुआ, वहाँ इंसान देवता और देवता से परमत्मा का रूप होते चले गए| अभी कुछ समय पहले मिडिल ईस्ट के दुबई और शारजाह आदि स्थानों पर जाने का अवसर मिला| कई स्थानों पर देखा कुछ वर्ष पहले वहाँ रेत ही रेत थी| वहाँ बहुत दूर से लाकर पानी पहुँचाया गया| इसलिए अब कुछ शहरों में हरियाली आ गई है| अब जहाँ जल पहुँचा, वहाँ तो हरियाली हो गई लेकिन उससे चार कदम बाहर आ जाएँ तो फिर वही तपती रेत ही देखने को मिलती है| यह जल वहाँ पहुँचाने का कार्य जिन्होने किया, वे उन लोगों के लिए राहत के कारण बने|

 

इसी प्रकार धरती पर स्वर्ग वही स्थान हैं जहाँ इन्सानियत है, जहाँ इंसान ज्ञान के उजाले में जी रहे हैं, जहाँ सभी संव्य को एक परमत्मा की संतार मानकर जी रहे हैं| केवल ऐसे स्थान ही सुन्दर हैं, वहाँ ही स्वर्ग का नज़ारा है, वहाँ ही जन्नत है| जहाँ हैवानियत है, जहाँ मासूमों पर ज़ुल्म किये जा रहे हैं, हक़ छीने जा रहे हैं, वे स्थान हरगिज़ पवित्र नहीं है और उन स्थानों की कोई महानता नहीं है|

 

साध संगत, संतों-भक्तों ने ही इस संसार का बचाव किया है, इसलिए तो कहा जाता है की -

 

सन्त न होते जगत में तो जल मरता संसार|

 

चारों और जलती आग से, जहाँ जल हो, कोई तालाब हो, वहीं राहत मिल सकती है| ठीक इसी प्रकार चारों और जलते हुए संसार में अगर कहीं राहत है तो वह इन भक्तों के कारण ही है| संत प्रवृति के कारण ही है, सज्जनता के कारण ही है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 112-113