साध संगत! प्यार निष्काम भाव से किया जाता है। 

जल बिना की मछली की जो हालत रहती है, भक्तों के मन की प्रभु के बिना वही हालत हुआ करती है। इसलिए जो वास्तव में भक्त होता है, उसी के बारे में कहा जाता है - 


ज्यों जल प्यारा माछरी, लोभी प्यारा दाम,
ज्यों मात प्यारा बालक, त्यों भक्त प्यारा राम। 
अर्थात मछली को जैसे जल प्यारा है, लोभी को दाम प्यारा है। जो लालची होते हैं, उनके लिए ही कहा जाता है की चमड़ी जाए पर दमड़ी  न जाए । इसी प्रकार भक्त को राम प्यारा होता है। साध संगत! प्यार निष्काम भाव से किया जाता है। जिस तरह से माँ  भी अपने बच्चे से प्रेम करती है, तो उसमें कोई स्वार्थ की भावना  नहीं हुआ करती है। वह यह नहीं सोचती की बच्चे ने जन्म लिया है, ये बच्चा बड़ा होगा, कमाकर लाएगा  फिर वो मुझे खिलाएगा, इसलिए मैं इसकी परवरिश करूँ, वो इसलिए परवरिश नहीं करती है। वो जानती है की उसकी रगों का रक्त, उसकी लिव (प्रीती) उसके साथ जुडी है। एक-एक धड़कन उसकी अपनी है। जरा सी आंच भी उसको आती है, तो उसको पीड़ा शुरू हो जाती है। वो एक निष्काम भाव से की हुई देखभाल है। वो निष्काम भाव से किया हुआ प्रेम है। इसी तरह से इस प्रभु के साथ भी ये भक्त निष्काम भाव से प्रेम करता है और कोई कामना रखे बगैर करता है। कहा भी है -
कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होए। 
भक्ति करे कोई सूरमा, जाती वर्ण कुल खोए। 
यानि भक्त लालसा के बगैर प्रेम किया करते हैं । वो प्रेम इसलिए करते हैं की यह आनंद का सत्रोत  होता है, सुख का सत्रोत  होता है। इस दिव्य चक्षु या ज्ञान दृष्टी को प्राप्त करने के लिए गृहस्थ छोड़ने की ज़रुरत नहीं । 

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 14-15