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तब सभी ओर खुशियाँ ही खुशियाँ हो जाती हैं|

 

एक बार कोई आदमी किसी गली से गुज़र रहा था, तो उसे एक मकान से लड़ाई-झगड़े की आवाज़ें सुनाई दी| वह रुक गया और उन्हें समझाने के इरादे से उस मकान से चला गया| देखा की पति और पत्नी क्रोध से लड़ रहे हैं| उस इन्सान ने पूछा की आप लोग क्यों लड़ रहे हैं? पति बोला की मैं अपने लड़के को डाक्टर बनाना चाहता हूँ, लेकिन यह मेरी पत्नी इसमें अड़चन डाल रही है| यह इस बात पर अड़ी है के बेटे को वकील बनाना है| उस इंसान ने कहा इसमें झगड़े वाली क्या बात है? आप बेटे को बुला कर, उसी से पूछ लें की वह क्या बनना चाहता है? हो सकता है, वह डाक्टर या वकील दोनों ही न बनना चाहता हो बल्कि कोई व्यापारी या इंजीनियर बनना चाहता हो| हो सकता है की वह आपको न बताना चाहता हो, उसे बुलाओ, मैं उससे पूछ लेता हूँ| यह सुनकर पति-पत्नी दोनों चुप हो गये| जब उस इंसान ने लड़के को बुलाने के लिए फिर कहा तो पति बोला, "जी, लड़का तो अभी पैदा ही नहीं हुआ है|" कहने का भाव की आज के (कथित) धार्मिक लोग प्रभु-ईश्वर के नाम पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने, एक-दूसरे को मारने-काटने के लिए हरदम तैयार रहते हैं, लेकिन इस प्रभु-ईश्वर को अपने ह्रदय में उन्होंने जन्म ही नहीं दिया| जब हम इसे अपने ह्रदय में जन्म दे लेंगे, जीवन में उतार लेंगे, तो फिर कोई कारण ही नहीं रह जायेगा की हम एक-दूसरे को पराया माने, एक दूसरे को बेगाना मानें अथवा एक-दूसरे को नीचा दिखाने का यतन करें|

 

ये सारे लड़ाई-झगड़े, कलह और आशांति तभी तक हैं जब तक हमारे ह्रदय में निराकार ब्रह्म का निवास नहीं होता, हमें ब्रह्मज्ञान नहीं होता, हमारा नाता प्रभु-परमात्मा से नहीं जुड़ता| इसके जीवन में उतरते ही सारा संसार सुखमय हो जाता है, सभी ओर खुशियाँ ही खुशियाँ हो जाती हैं|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-1, पेज 12-13