मन के जीते जीत 

साधसंगत! जिस तरह से एक लालटेन के ऊपर कोई पतंगा, कोई कीड़ा बैठा हुआ है| उस पतंगे का अक्स, उसकी परछाई, सामने दीवार के ऊपर पड़ती है| अगर हम कहें की उस दीवार पर बैठे पतंगे को हटाना है और हम कोई झाड़ू ले लें, कोई सोटी (डंडा) ले लें या हाथ से ही उसे हम दीवार से हटाना चाहे, तो वह नहीं हटेगा, वह वहीँ पर रहेगा|  क्योंकि वह पतंगा दीवार पर नहीं बैठा हुआ है, वह लालटेन पर बैठा हुआ है| उसे लालटेन से हटाएँगे तो वह खुद-ब-खुद दीवार से भी हट जाएगा|

 

इसी तरह से जो भी लालसाएं, तृष्णाएँ हैं, ये मन में बैठी हुई हैं| मन में ही अभिमान होता है, मन ही सचित होता है| बैठे कहीं होते हैं, यह मन कहाँ की सोच रहा होता है, कहाँ पर इसका ध्यान लगा होता है| महापुरुष इस मन को अर्पित करता है| हम चाहे कुछ भी अर्पित कर देते हैं, दान पुण्य भी कर देते हैं, लेकिन मन में अभिमान बना हुआ है, तो महापुरषों ने कहा -

 

कबीर माइआ ताजी न किआ,

भाइआ जउ मानु तजि आ नहीं जाइ||

 

अगर सब कुछ अर्पित कर दिया, लेकिन मन का ये अभिमान बना रहा, तो कुछ भी बनने वाला नहीं| हमें मन को समझाना है| अगर हम मन को अपने फर्जों की अदायगी करते हुए एक प्रभु के साथ जोड़ लेते हैं, तो हम फिर ही निर्लिप्त रह सकते हैं, एक निर्लेप अवस्था वाले हो सकते हैं|

 

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 69