मैं शरीर में रहता हूँ 

 

मनुष्य की अज्ञानता यह है की वह अपने को शरीर ही माने बैठा है और मैं यह शरीर ही हूँ, यह समझता है| यह शरीर तो हमेशा रहने वाला नहीं है| यह तो पाँच तत्वों का  पुतला है| जब इन पाँच तत्वों से इस शरीर का नाता टूट जाता है तो शरीर का अंत हो जाता है|  मनुष्य शरीर तक ही सीमित है| वह तन को ही सब कुछ माने बैठा है| यही उसकी अज्ञानता है| उसके लिए यह समझना आवश्यक है की वह कौन है| मनुष्य कहता है की यह मेरा हाथ है, मेरा सिर है, मेरे पाँव हैं, मेरी आँखे हैं, मेरे कान हैं| अगर मनुष्य शरीर है तो शरीर कहे की मैं आँख हूँ, मैं कान हूँ, मैं सिर हूँ, आदि| लेकिन नहीं| जिस तरह हम मकान में रहते हैं तो हम यह नहीं कहते की मैं मकान हूँ मैं अलमारी हूँ| हम मकान के बीच में रहते हैं| हम चेतन हैं| इसलिए मनुष्य को कहना चाहिए की मैं शरीर में रहता हूँ| मनुष्य को इसी अज्ञानता को दूर करना होगा|

 

मनुष्य तब तक है, जब तक शरीर है| जब तक शरीर है, तब तक ही तो उसके अन्दर आत्मा का वास है| इस आत्मा को परम आत्मा से अपना नाता जोड़ कर इस दूरि को समाप्त करना होगा| तभी सुख है, चैन है| तभी पार उतारा है| तभी आवागमन के बन्धनों से छुटकारा है| जब तक आत्मा का परम सत्ता से मिलन नहीं हो जाता, मनुष्य इस तरह भटकता रहेगा| अत: मनुष्य के लिए यह जरूरी है की वह परमसत्ता से अपना नाता जोड़ लें|

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 11