महापुरुष आग लगाने का काम नहीं करते 

 

जो संत-महापुरुष होते हैं, जो वास्तव में भक्त होते हैं, वे आग लगाने का काम नहीं करते, वे तो आग बुझाने का काम किया करते हैं| उनके पास शीतलता होती है, उनके पास किसी का नुक्सान करने का साधन नहीं होता और इसी में महानता होती है| वे गिराने के मार्ग पर नहीं चलते, उठाने के मार्ग पर चलते हैं| गिराने वाला सोचता है मैं बड़ा बहादुर हूँ, लेकिन युगों-युगों से ये नियम स्थापित हो चुका है की बचाने वाला ही हमेशा महान गिना जाता है| ज़ख्म किसी भी चीज से पहुँचाया जा सकता है, लेकिन ज़ख्म भरने वाले क्या हमें घर-घर मिल सकते हैं? हर एक गली में मिल सकते हैं? नहीं| ऐसा नहीं होता| एक गाँव में किसी को चोट लग जाती है, तो शहर की तरफ भागता है| शहर में भी पूछता है की यहाँ कोई डाक्टर साहब हैं? तो जवाब मिलता है आगे चले जाइए, अगले मोहल्ले में चले जाइए| वहाँ पर तुम्हें अस्पताल या डाक्टर मिल जाएगा|

 

कहने का भाव, ज़ख्म  भरने वाले हमें गली-गली में नहीं मिलेंगे, क्योंकि यह एक महान कार्य है, जिसे करने वाले विरले हुआ करते हैं| एक कपड़े को टुकड़े-टुकड़े करने में कोई जोर नहीं लगेगा| एक बच्चे को कैंची दे दीजिए, वो मिनिटों में उसके कई टुकड़े कर देगा| लेकिन इतने टुकड़ों को एक सैकिंड या मिनट में सिला नहीं जा सकता| उसकी सिलाई में बड़ी मेहनत लगती है, उसमें बड़ी कारीगरी दिखानी पड़ती है|

 

महापुरुषों में आखिर ये गुरमत के गुण आते कहाँ से हैं? ये गुण हमेशा संतों के साथ रहने से ही, उनकी सेवा में ही मिलते हैं| साधु की संगति हमेशा हमारे में ऐसी महानता भर सकती है, हमारे मनों में एक अमृत का रस भर सकती है, हमारे जीवन में गुण प्रवेश करा सकती है| लेकिन जरूरत यही है की समर्पित भाव से, गुरमुख महापुरषों से अपना नाता जोड़ें, कहीं पर बीच में फिर कोई अभिमान रुपी दीवार आ गई, कोई ऐसा पर्दा आ गया, तो फिर हम कंचन बनने में वंचित हो जाया करते हैं| साध संगत! इस साध संगत का प्रताप हमेशा से गाया जाता है|

 

भक्त की यही चाह रहती है की मुझे महापुरषों की संगती मिलती रहे और चाहे संसार में किसी भी तरह से विचरण करना पड़े, किसी तरह से भी चढ़ाव-उतार आ जाएँ, जैसा भी खाने को मिल जाए, चाहे जौ की भूसी ही क्यों न खाने को नसीब हो, लेकिन कभी मनमुख की संगति न मिले| हमेशा गुरुमुखों की संगति ही मिलती रहे, क्योंकि गुरुमुखों की संगति ही हमारे विश्वास को परिपक्व करती  है, हमारा इस परमात्मा के ऊपर अकीदा बना देती है| फिर कभी हम भटकते नहीं है और इस सदमार्ग पर चलते रह्ते हैं| हम सत्य की डगर पर चलते जाते हैं| साधसंगत का ही प्रताप होता है की हमारी बुद्धि विवेक-बुद्धि बन जाती है| उसको पता चल जाता है की बुरा क्या है, भला क्या है? फिर यह बुराई के रास्ते पर चलना बंद कर देती है, और भलाई के रास्ते पर ही चलती है| साध संगत! इसके बगैर कभी भी इंसान का कल्याण नहीं हुआ है| इंसान का कल्याण तभी हुआ है, जब इसको ऐसी बुद्धि मिली है, ऐसी सुमति मिली है| यह सुमति महापुरषों की संगति करके मिलती है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 89-90