महानता शरीर की नहीं, कर्म की 

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गुरमुख-महापुरुष इस सत्य को जानते हैं की यह जो शरीर मिला है, यह तो एक न एक दिन जाना ही है| सदैव किसी का शरीर नहीं रहा | पुरातन समय में भी जो भक्तजन-संतजन हुए, उन्होंने इस संसार पर बहुत परोपकार किया, इंसानियत को अच्छा मार्ग दिखाया, लेकिन शरीर उनके भी नहीं रहे| कहने का भाव, महापुरुष हमेश दिल में बसाकर रखते हैं की इन शरीरों की कोई महानता नहीं हुआ करती, महानता होती है इस जीवन की| जिस जीवन से दूसरों को महक मिले, निराकार-दातार पर अकीदा कायम रखने की प्रेरणा मिले, जिसमें हर एक के दुःख-सुख में शरीक होने का ज़ज़्बा हो, उसी जीवन की महानता हुआ करती है | इसके विपरीत जिस जीवन में मात्र बोल हों, जो यह समझे की मैं बड़ा अच्छा बोलता हूँ, बड़ीअच्छी व्याख्या कर लेता हूँ जिस कारण मेरा यश हो रहा है, मेरी महिमा हो रही है या मैं पूर्ण भक्त बन गया हूँ, तो उस जीवन  की कोई महानता नहीं होती क्योंकि वे पढ़ाईयाँ, वह कला अथवा वे बोल ही उसे कुछ प्रदान नहीं कर पाते वास्तव में महानता कर्म के साथ जुड़ी होती हैं|
-----सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह  जी----बुक : गुरमत समारिका, 2010, पेज 36 
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