जो गुरसिख का निरादर कर रहे होते हैं, वे गुरु का ही निरादर कर रहे होते हैं

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अगर गुरमुख ह्रदय में नम्रता रखता है, दूसरे की गलतियों को नहीं चितारता तथा मिठास के साथ पेश आता है, तब ही वह अपने मालिक को रिझा सकता है, खुश कर सकता है. अक्सर कह दिया जाता है की 'गुरु की निन्दा सुनें नहीं काना.', गुरु की निंदा करने वाले तो गुरमुखों में भी शायद विरले हों, लेकिन दूसरे तरीके से गुरु की निंदा करने वाले अनेकों मिल जाते हैं. जो गुरसिख का निरादर कर रहे होते हैं, वे गुरु का ही निरादर कर रहे होते हैं. जो गुरसिख की निंदा कर रहे होते हैं, वे गुरु की ही निंदा कर रहे होते हैं.

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज, बुक : दर्पण, पेज 106
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