Saints, please like us



जब तक इंसान में 'मैं-मैं' की भावना रहती है, तब तक उसकी कोई कद्र नहीं होती|

 

 संतों ने सदा गुरुमुखों के साथ को महानता दी है, किसी कीमत पर भी मनमुख का, साकत का संग न करने की प्रेरणा दी है :

 

साधु की संगत रहे, जौ की भूसी खाय|

होनहार सो होए है, साकत संग न जाय||

 

 

महापुरषों की संगत मिलती रहे और चाहे संसार में किसी भी तरह से विचरण करना पड़े, किसी तरह से भी उतार-चढ़ाव आ जाएँ, जैसा भी खाने को मिल जाये, चाहे जौ की भूसी ही क्यों न खाने को नसीब हो, लेकिन कभी मनमुख की संगति न मिले| हमेशा गुरुमुखों की संगति ही मिलती रहे, क्योंकि गुरुमुख की संगति ही हमारे विशवास को परिपकव करती है, हमारा इस परमात्मा के ऊपर अकीदा (विशवास) दृढ़ करती है| फिर कभी हम भटकते नहीं हैं और हम सदमार्ग पर चलते रहते हैं| हम सच की डगर पर चलते जाते हैं| संतों के संग का ही प्रताप होता है की हमारी बुद्धि, विवेक बुद्धि बन जाती है| इसको पता चल जाता है की बुरा क्या है, भला क्या है? फिर यह बुराई के रास्ते पर चलना बंद कर देती है, और भलाई के रास्ते पर चलती है| सन्तों के संग के बगैर कभी भी इन्सान का कल्याण नहीं हुआ है| इन्सान का कल्याण तभी हुआ है, जब इसको ऐसी बुद्धि मिली है, ऐसी सुमति मिली है| यह सुमति महापुरषों की संगति से ही मिलती है|

 

महापुरुष फरमाते हैं ---"जो जाने आपस को नीचा, सो ही गिनिये सब ते ऊंचा' --भाव, जो अपने को नीचा मानता है, वही सबसे ऊंचा, सबसे महान माना जाता है, उसका नाम सन्तों-महापुरषों की श्रेणी में आ जाता है, पूजने योग्य हो जाता है| वह अभिमान नहीं करता, क्योंकि अभिमान से सभी को घृणा होती है| संसार का इन्सान अगर किसी हाई पोस्ट (उच्च पद) पर लगा होता है तो वह जहाँ भी चर्चा करता है, "मैं-मैं' की ही चर्चा करता है, की मेरे में इतनी ताकत है, मैं यह कर सकता हूँ| इसी प्रकार किसी को कोई मान-बड़ाई मिल जाती है तो उसे भी 'मैं' खाने लगती है| ऐसे ही किसी को मान होता है, अच्छी रचना करने का, गीतकार बनने का, लेकिन जब तक इंसान में 'मैं-मैं' की भावना रहती है, तब तक उसकी कोई कद्र नहीं होती, उसका नाम नहीं होता, भले ही वह किसी जाति से ताल्लुक रखने वाला हो या उसने कितनी ही डिग्रियां हासिल कर रखी हों| गुरमुखों ने क्योंकि नम्रता को अपनाकर रखा है, इसलिए इनका सहज ही सत्कार होने लगता है, इनके वचनों को संसार पढ़ता है, उनको महानता देता है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-1, पेज 41-42