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इन्सान ने अपने लिए खुद नरक बना लिया 

 

जिस तरह से किसी के चारों तरफ दीवारें बना दी जाएँ तो उसको बाहर की दुनिया दिखाई नहीं देती| उसे संसार की वास्तविकता नज़र नहीं आती| वह सारे संसार से कटा होता है, और अपने आप को बड़ी कठिनाई में महसूस करता है| आप जानते हैं कि जो अपराध करते हैं, उनको कोठरियों में रखा जाता है| वहाँ पर उनको सलाखों के पीछे बंद करके रखा जाता है, वह बाहर की दुनिया से कटा होता है| वह बंद कमरे में बैठा होता है और उसका एक-एक पल नरक समान बना होता है|

 

इन्सान ने अपने लिए खुद नरक बना लिया, जब उसने अपने चारों तरफ दीवारें खड़ी कर दी| कहीं पर जाति की दीवार खड़ी कर दी, कहीं पर रंग भेद की, कहीं पर भाषा की, कहीं पर मजहब की दीवार खड़ी कर दी|

इन दीवारों में बंद वह केवल अपने आप को ही देखता है, अपने स्वार्थ के लिए ही सब कुछ सोचता है, अपनी लालसाओं की पूर्ती की और ही ध्यान देता है| नतीजा है, आपसी टकराव, अलगाव, दुःख और कष्ट|

 

जब तक इंसान ऐसी दीवारें नहीं गिराता, तब तक वह सुर्खरू नहीं होगा, कभी चैन से नहीं रह पायेगा| समाज में बहुत सी अनेक्ताएं हैं - अनेकता पहरावे में है, अनेकता भाषा में है,  अनेकता रहन-सहन, खान-पान के ढंग में है| यदि एक प्रभु-परमात्मा के साथ नाता जुड़ जाए तो यही अनेकता एकता में तब्दील हो जाती है| एकरूपता (Uniformity) तो कभी नहीं लाई जा सकती| युनिफोर्मिटी का मतलब है - एकसार करना| एक तरह का पहरावा, एक तरह से रहने का ढंग, यह कभी भी संभव नहीं| इस तरह से कभी मनों में नजदीकी नहीं आ सकती| यहाँ तो यूनिटी की जरूरत है, एकता की जरूरत है, जो एक प्रभु-परमात्मा के द्वारा ही संभव है| जिस तरह से हमने एक माला बनानी हो तो माला में धागे का होना जरूरी है, फिर उसमें लाल रंग का फूल भी पिरोया जा सकता है, उसमें पीले रंग का भी फूल पिरोया जा सकता है, उसमें सफ़ेद रंग का फूल भी पिरोया जा सकता है, लेकिन अगर धागा ही नहीं, तो कभी माला नहीं बन सकती| इसी तरह मानवता की माला एक प्रभु-परमात्मा के धागे के बिना बनने वाली नहीं|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-1, पेज 10-11