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गुरमुख और मनमुख में क्या अंतर होता है?

 

वास्तव में गुरमुख और मनमुख में यही अन्तर होता है कि मनमुख हमेशा सांसारिक पदार्थों के साथ जुड़ा रहता है और हरी को भूल कर अभिमान में रहता है| उसके हाथ में थोड़ी सी भी शक्ति आ जाती है, तो वह उसी के अभिमान में आ जाता है और हरि-दातार से दूर करने वाली बातें करने लगता है|  भले ही प्रकट में वह किसी को यह नहीं कहता की तू प्रभु की भक्ति को छोड़ कर इन पदार्थों में लग जा, लेकिन उसका कर्म ऐसा होगा, जो हमें इस प्रभु-दातार से दूर ले जानेवाला होगा| इसीलिए महापुरुष हमेशा हमें मनमुख की संगति से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं, क्योंकि मनमुख हमेशा हमारे विश्वास को डुलायमान करने वाला होता है|

 

बाबा अवतार सिंह जी एक बार पूछने लगे की आपका सखा कौन है, आपका सबसे बड़ा मित्र कौन है? सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? सभी ने अपनी-अपनी राय प्रकट की| किसी ने कहा की मित्र-सखा वही है, जो वक्त पर काम आये, हमें दुखी देखे तो वह हमारी मदद को आ जाए और दुश्मन वह है जो हमारे मार्ग में रुकावटें खड़ी करे, हमें गिराने की कोशिश करे, संसार के सामने हमें बुरे रूप में प्रकट करे| तब बाबा जी ने कहा - नहीं, आपका सबसे बड़ा मित्र वही है, जो आपको गुरु के साथ जोड़ता है,  जो निरंकार पर आपका विशवास दृढ़ करता है, जो साध संगत के साथ, सुमिरन के साथ जोड़ता है, जो सेवा की प्रेरणा देता है, और दुश्मन वह है, जो आपको गुरु से दूर करता है, निराकार-दातार पर आपके विशवास को डुलयमान करता है|

 

साध संगत! गुरमुख की यही पहचान होती है की वह हमारा सच्चा मित्र बनता है, हमेशा हमारे विशवास को पक्का करता है, हमेशा दूसरे महापुरषों की स्तुति (प्रशंसा) करता है तथा हमें यही प्रेरणा देता है की हम कभी पूर्ण नहीं हो सकते, पूर्ण केवल दातार-निरंकार ही होता है लेकिन हम क्या करते हैं? हम दूसरे को नीच मानने लग जाते हैं| जब ऐसा मानने लगते हैं, उसी पल हम दूसरे की निंदा करने लग जाते हैं| इसके विपरीत जब हम महात्मा की संगति करते हैं, तो हममें ऐसी नम्र भावना आ जाती है, की मेरे में अवगुण हैं, मैं लालच भी कर लेता हूँ, क्रोध भी कर लेता हूँ, निंदा-बखीली भी कर लेता हूँ, इसीलिए मैं पूर्ण नहीं हो सकता| किसी एक काम में मैं पूर्ण हूँ, मैंने किसी का धन नहीं दबाया, मैं व्यापार में दूसरे के साथ बहुत साफ़ व्यवहार करता हूँ, लेकिन दूसरी तरफ में निंदा में सबसे आगे हूँ, दूसरों की निरादारी में सबसे आगे हूँ, तो मेरी वह पूर्णता समाप्त हो जाती है| जो हमें ऐसी बातों का अहसास करवाता है, वह ही हमारा सच हितैषी होता है, हमारे हित चाहने वाला होता है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-1, पेज 31-32