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ज्ञान के बगैर कर्म को अँधा बताया गया है 

 

ब्रह्मज्ञानी भक्तों के जीवन में ज्ञान और कर्म, दोनों की हमेशा से विशेषता रही है| जिस तरह पंछी, जो आकाश में उड़ान भरता है, आकाश में बहुत ऊंचा उड़ जाता है, तो उसके लिए भी यह शर्त है, की उसके दोनों पंख काम कर रहे हों| अगर उसका एक पंख काम नहीं करेगा, तो वह कभी भी ऊंचा नहीं उठ पाएगा और ज़मीन पर ही रेंगता रहेगा| इसी तरह संत का भी एक कर्म रुपी पंख मान लें, और दूसरा ज्ञान रुपी पंख| भक्ति में ज्ञान और कर्म दोनों ज़रूरी हैं| ज्ञान के बगैर कर्म को अँधा बताया गया है और कर्म के बगैर ज्ञान को लंगड़ा कहा गया है| इन दोनों का तालमेल बहुत ही आवश्यक है| तभी हम ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकते हैं|

 

सिद्धान्त (Theory) के साथ-साथ व्यवहार (Practical) भी ज़रूरी होता है, तभी कोई विद्या या साइन्स ग्रहण की जा सकती है| यही बात ब्रह्म विद्या की भी है| सन्त केवल कह कर ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन जी करके समझाते हैं| वचन की अपेक्षा कर्म का असर ज्यादा होता है| ज्ञानी भक्त सदा कर्म करते हुए ही बोलते हैं और उन बोलों पर चल कर औरों को भी चलने की प्रेरणा देते हैं| आज बोलों की तो कोई कमी नहीं है, आज हमारे सामने बहुत ऊंचे बोल (बहुत महापुरषों के मुखारबिंद से निकले हुए वचन) शास्त्रों के रूप में हैं, बड़े-बड़े  वेदों के रूप में, ग्रंथों के रूप में हैं| युगों-युगों से बहुत बातें कही गई हैं| दास नहीं समझता की कुछ और कहने को बाकी है| कहा तो बहुत कुछ गया है, लेकिन ज़रुरत कर्म की है, उन महापुरषों द्वारा बताई बातों के अनुसार जीवन जीने की है| समाज को सदा उन्होंने आदर्श बनाया है| जिन्होंने उन वचनों को जीवन में उतार लिया|

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-1, पेज 49